रंग और उजास

रंग और उजास

शुक्रवार, मई 28, 2010

कुछ सूफियाना सा..

इस बार कुछ शेर हैं, जिन से बात शुरू करता हूँ..

तू सुन के मेरी इल्तिज़ा क्या करेगा
जो पहले से सोचा हुआ था, करेगा
... और

आइना तुम भी हो, आइना मैं भी हूं
देखूं तो आती है लौट कर रोशनी


मौला ऐसा सलीका हमें बख्श दे
हम लुटाते रहें उम्र भर रोशनी
... ...

शेर हमारे साथी योगेन्द्र मिश्र की ग़ज़ल से हैं.

योगेन्द्र, रीवा के हमारे युवा समूह में बहुविध चर्चित नाम रहे हैं, बहुत सारे क्षेत्रों में योगेन्द्र की प्रतिभा को स्वीकार किया जाता रहा है. गंभीर से गंभीर काम को पूरी गंभीरता से निभाने के लिए भी और गंभीर से गंभीर बात को मन की मौज हो तो हवाओं में उड़ा सकने की उन की विलक्षण योग्यता आज भी हम मित्रों के बीच चर्चा का विषय होती है, उन के पास अद्भुत और अधिकतर अकाट्य तर्क क्षमता है जो कुछ अर्थों में उनके ओशो के शिष्य होने का सही परिचय देती है. कभी-कभी कुतर्क में भी वे सिद्ध हैं, उनकी एक खास अदा रही है(शायद इसे उनकी मज़ा लेने की अदा कहना चाहिए) कि वे देर तक आप का समर्थन करते हुए यदि आपके सामने वाले से सहमत होने की सही फीस (सहमत होने की ये फीस उस समय 5 रू. हुआ करती थी) मिले तो फीस के मुताबिक आपके विरोधी से भी उतनी ही दमदार सहमति दिखा सकते हैं, कॉलेज के समय में ये मजे लेने का उनका खेल, हमारे रंगसमूह के खासे मनोरंजक खेलों में से एक रहा है. वैसे ये खेल सिर्फ बातों-बातों का ही खेल बना रहा.

योगेन्द्र, दर्शन शास्त्र और हिन्दी के मेधावियों में से हैं. वे एक अच्छे रंगकर्मी के साथ-साथ कॉलेज के समय से एक अच्छे वक्ता के रूप में जाने जाते हैं, तथ्य और तर्क को सम्मिश्रित कर के एक लगभग चकित कर देने वाला प्रस्तुतिकरण कौशल योगेन्द्र की पहचान का हिस्सा है. भीतर से संवेदनशील और संघर्षशील अपने मूल भोले स्वभाव को वे एक खास किस्म के आक्रामक ऊपरी व्यवहार के भीतर सहेजे रखना चाहते हैं. योगेन्द्र ने जिन परिस्थितियों में अपने व्यक्तित्व को साधा और सहेजा है, उसके बारे में ज्यादा कुछ कहने से बेहतर सिर्फ इतना ही समझना काफी है कि जहां लोग फिसल कर अंधी खोह(ब्लैक होल) में गुम जाया करते हैं वहां उन्होने तमाम संघर्षों के बीच खुद के लिए स्वयं एक रोशन राह बनाई है.


रोजी-रोटी के लिए वे पुलिस की नौकरी करते हैं और आज भी ग़ज़लें लिखते हैं, कई पुलिस वाले यूं तो उपन्यास लिखते ही हैं, पर योगेन्द्र ग़ज़लें लिख रहे हैं, और खूब लिख रहे हैं. उनकी नौकरी और उनके मूल स्वभाव के बारे में शायद यही कहना ठीक है कि गलत जगह पर सही आदमी.. देखने की बात यही है कि वे पुलिसिया दांव-पट्टी से खुद को और अपनी ग़ज़ल को कैसे और कब तक बचाते हैं.. चलिए ये तो हम समय के साथ देखेंगे ही पर आइये अभी उनकी दो बहुत खूबसूरत ग़ज़लें यहां देखें...

योगेन्द्र की ग़ज़लों में एक खास किस्म का सोंधापन है जो उनकी संवेदना, संघर्ष, प्रतिबद्धता और उनके भीतर के सूफियाने की संगत का मिला-जुला सा कुछ बन कर सामने आता है. उनके रचनाकर्म की पहचान उनकी ये दोनों ग़ज़लें मुझे उनके भीतर का बेहतर परिचय समझ आती हैं सो उन्हें आप सब के साथ बांटता हूं... फिर बतायें कि ....

1.

दम-ब-दम रोशनी, दर-ब-दर रोशनी
मेरे मेहबूब की रहगुज़र रोशनी

उसने देखा तो दिल में दिये जल उठे
उसकी ऑंखों में थी इस कदर रोशनी

जाने कितने उठाये सितम दौर के
तब कहीं बन सकी हमसफर रोशनी

तुम न जाओ कहीं, सिर्फ बैठे रहो
और बिखरती रहे रात भर रोशनी

आइना तुम भी हो, आइना मैं भी हूं
देखूं तो आती है लौट कर रोशनी

मौला ऐसा सलीका हमें बख्श दे
हम लुटाते रहें उम्र भर रोशनी

वक्त की कोख में पलती रहती है पर
सबको आती नहीं है नज़र रोशनी



2.

तू सुन के मेरी इल्तिज़ा क्या करेगा
जो पहले से सोचा हुआ था, करेगा

मेरे दिल की भी तू लगायेगा बोली
तू बाज़ार में है भला क्या करेगा

मेरे पास दिल है, दुआयें हैं तेरी
कोई शख्स मेरा बुरा क्या करेगा

जो तक्मील करता नहीं अपने वादे
वो हक़ मे किसी के दुआ क्या करेगा

जो तासीर तेरी वो तक़दीर होगी
तू जन्नत का ले के पता क्या करेगा

अभी ख्वाब ज़िंदा हैं मेरे ज़ेहन में
अभी से मेरा फैसला क्या करेगा

11 टिप्‍पणियां:

  1. मानवीय अनुभूतियों को अभिव्यक्ति देती बेहतरीन गजले....आप के सार्थक प्रयास हेतु शुभकामनाएं।

    उत्तर देंहटाएं
  2. Yogendra Ji bahut khub!
    Jinda rakhiye un jajbato ko jo aapke nitant apnepan ko jinda rakh sake,jo aapki khushboo ko is dunia main udelati rahe.Jai Ho!

    उत्तर देंहटाएं
  3. योगेन्द्र जी के बारे में यहाँ जो लिखा गया है उसमें काफ़ी सच्चाई है.उनके बारे में मैं कह सकता हूँ कि प्रमाणपत्र के अनुसार वे कम उम्र भी हैं.मुझसे केवल एक साल बड़े.यहाँ जो छोटी सी बात मुझे याद आ गयी है चूँकि उसका संबंध उम्र से है इसलिए उम्र ध्यान में लाने के लिए माफ़ी चाहता हूँ.
    जिन दिनों उनके शिष्यनुमा मित्रों की अच्छी खासी तादाद हो गयी थी और मैं मन ही मन उनसे काफ़ी प्रभावित भी रहता था युवा उत्सव के दौरान वि.वि के सभागार में मेरी उनसे छोटी सी भेंट हुई.काफ़ी बातों में से उनकी इस बात ने मुझे उनसे बहस करने को उकसाया
    उन्होंने कहा था कि मैं भगवान को नहीं मानता.प्रेम ही भगवान है.जब मैं किसी को प्यार करता हूँ तो इसकी परवाह नहीं करता कि बदले में दूसरा भी प्रेम करे.
    मैंने कहा कि यह तो लोभ है.ऐसा प्रेम केवल वस्तु से ही किया जा सकता है.जिसमें दूसरे की भावात्मक उपस्थिति हो ही नही.रामचंद्र शुक्ल ने लिखा है कि वस्तु से हमारा प्रेम लोभ है क्योंकि यहाँ प्रेम की अपेक्षा नहीं होती.पर व्यक्ति से तो हम बिना समान प्रेम की कामना के प्रेम कर ही नहीं सकते.
    योगेन्द्र जी पर मेरे इस उद्धरण का यह असर हुआ था कि उन्होंने तुरंत मुझे बात करने लायक समझ लिया.हम बात करते हुए गैलरी में खड़े थे.बाक़ी लोग कुलपति से अपनी मागों के लिए मिलने की तैयारी में थ.तब उन्होंने जो बात कही मैं योगेन्द्र जी को उसके आधार पर समझने की कोशिश करता रहा हूँ.
    उन्होंने कहा था कि तीस साल तक किसी को किसी वाद से नहीं जुड़ना चाहिए.लोगों को सिर्फ़ सभी विचारधाराओं की उचित शिक्षा मिलनी चाहिए.इसके पहले किसी को विचारधारा में शामिल कर लेना प्रतिभा प्रशिक्षण है.और यह अपराध है.
    मैं उनकी इस बात का मुरीद हो गया था.पर जाने किस आवेग में मैंने पूछ लिया था कि आप करते क्या हैं.आपका सही परिचय क्या है?
    योगेन्द्र जी ने जवाब दिया था मेरा नाम स्वामी ध्यान योगेन्द्र है.मैं ओशो का सन्यासी हूँ.
    मैंने तुरंत पूछा था कि क्या आपकी उम्र तीस साल से ज्यादा है?उन्होंने झूठ नहीं बोला था.तब मेरी जिज्ञासा थी कि फिर आप ओशो के संन्यासी क्यों हो गए?
    योगेन्द्र जी ने प्रकटत:इसका बुरा नहीं माना था लेकिन मुझे बाद की मुलाकातों में इस गुस्ताखी का असर दिखता रहा...
    फिर सबको पता जैसा था कि योगेन्द्र जी को एक दिन बेहतर अध्यापक बनना है लेकिन वे बेरोज़गारी से तंग आकर पुलिस में चले गए.
    इस संबंध में भी उन्होंने एक बार मुझसे कहा था कि तुम्हे वही बनना चाहिए जो बनना चाहते हो चाहे इसकी जो क़ीमत चुकानी पड़े.
    मैं इन्हीं विराधाभासों को देख पाने और कुछ उनके शिष्यनुमा दोस्तों की बदौलत उनके भरोसेमंद समूह का सदस्य नहीं बन पाया.पर बाद में जब मैं ओशो और जे कृष्णमूर्ति तथ खलील जिब्रान को पढ़ पाया तो मुझे एक मेधावी दिमाग़ की समर्पित बौद्धिकता समझ में आ गयी.जब भी वे कोई मारक चुटकुला सुनाते मैं उसे जल्दी ही ओशो के प्रवचनों में पढ़ पाता.
    मैं ओशो का विरोधी नहीं हूँ.उन्हें ऐसा दार्शनिक और शिक्षक मानता हूँ जिसके लिए आनेवाले समय में लोग महान शब्द का प्रयोग बेहिचक करेंगे...पर किसी को खारिज करने के लिए उनकी तर्क पद्धति को शिखर की तरह इस्तेमाल करनेवालों से मुझे निजी क़िस्म की अपत्ति रही है.खैर
    यह सच है कि दोस्तों में योगेन्द्र जी की लोकप्रियता काफ़ी थी.अखबारों में मैंने उनके लिए विचारक के विशेषण भी पढ़े हैं.उनकी उमर के लोगों को पैर छूते देखा है.वे चाहे किसी की पैरोडी कर सकने में समर्थ बेहद दिलचस्प बातूनी शख्स हैं.काफ़ी हद तक प्यारे इंसान भी.मैंने उनका गालियों से विकृत वह चेहरा भी देखा है जो कांति कुमार जैन के ओशो पर संस्मरण छपने के दौरान प्रकट हुआ था.
    मुझे अंदाज़ा है कि इन बातों से किन्हें वास्तव में दुख पहुँचेगा.लेकिन मेरा मकसद यह नहीं है.
    मुझे उनकी कुछ कविताएँ और ग़ज़लें जिनमें आरोपित अध्यात्मिकता नहीं हैं बेहद पसंद हैं.मैंने इस प्रतिक्रिया के रूप में जिसका श्रेय विवेक जी को जाता है योगेन्द्र जी को नाराज़ कर लेने की परिस्थिति पैदा की है लेकिन उनके प्रति असम्मान मेरा कभी मकसद नहीं रहा.

    उत्तर देंहटाएं
  4. Shashi,
    Main tumhe kya kahun?
    Umra to meri 34 saal hai.19 ki umra me main osho ka sannyasi ho gaya tha. Bachpan se hi dhyan-sadhna me ruchi thi.puja-path, yog-pranayam se hota hua osho tak pahuncha.jeevan ko puri vaigyanikta se dekhna aur sab taraf se khula hona maine unse hi seekha.unse mera rishta vishudh anubhav ka rishta hai,vichar ka nahi. prem to main ab bhi beshart karta hun.balki yun kahun ki aisa hota hai.osho bahut adhik roshni wale the,unhe dekhne ke liye aankho me roshni sahne ki taaqat honi chahiye.
    Main osho ka sannyasi hun….aur yahi mera parichay hai…
    Ant me itna hi kahunga:
    Sau bar tera daaman,haatho me mere aaya,
    Jab aankh khuli,dekha,apna hi gareban tha.
    Aur haan….chutkule mere paas dhero hain..aur sab osho ki kitabon ke nahi hain.
    Zindgi ki kitab bahut badi hai….usi ko padhta rahta hun….

    उत्तर देंहटाएं
  5. ek baat chhoot gayi thi shashi,jis mulaqat ka tum zikra kar rahe ho,us se pehle hum kai baar mil chuke the,aur achchhi tarah mil chuke the.aur rahi baat vaadon se jodne ki, to mera aaj bhi yeh maanna hai ki kisi ko apna brainwash karne ka theka dena ghulam hona hai.ek baat aur--osho ne oregon,america me 'rajneeshism' naam ki pustak ki holi jalwa di thi,kyonki unki jankari ke bina wo pustak chhapwa di gayi thi aur unhone zor dekar kaha tha ki rajneeshism jaisi koi cheez nahi hai.is baat ko bhali bhanti samajh lo ki osho ka koi vaad nahi hai.
    tumko ek hi baat kah sakta hun:
    aapan tej samharo aape,
    teeno lok aap te kaanpe...

    उत्तर देंहटाएं
  6. विश्वदीपक7:35 am, जून 01, 2010

    यार शशिभूषण,
    क्या हो गया है तुम्हे? मुलाकात तो मेरी और तु्म्हारी भी एकाध बार की है तो क्या मैं भी उसी मुलाकात के आधार पर तुम्हारी छवि को एकदम पक्का कर दूं? यार, कभी तो रामचंद्र शुक्ल को एक किनारे रखो।
    और एकदम-पक्का-खालिस महज और महज इंसान होने के नाते मिलो!
    ठीक है, तुम्हारा प्यार बदला मांगता है और किसी का नहीं मांगता तो इसमें क्या हर्ज है? वैसे भी प्यार नितांत निजी मामला है। इसकी अभिव्यक्ति लोग अपने-अपने ढंग से करते है। तुम जानते हो कि दुनिया में प्यार ही ऐसी चीज है जो हर कोई करता है। और हर किसी का प्यार करने का तरीका दूसरे से एकदम अलग होता है। दुनिया में उतनी तरह के प्यार हैं जितनी कि आदमियों की तादात।
    योगेन्द्र को मैं भी जानता हूं। उनकी सफलताएं और व्यक्तित्व रीवा जैसे कस्बे के लिए चमत्कारी थीं संभवत: इसीलिए लोग पैर छूते रहे होंगे। लेकिन ये रीवा की कंगाल मानसिकता है। योगेन्द्र इसमें रिसीविंग एंड पर थे यार। क्या करते? याद करो दादा के पैर छूने वालों की तादात। तुम जिस कॉलेज में पढ़े हो उसका प्रींसिपल भी सबके सामने दादा का दंडवत करता था।
    असल,में योगेन्द्र का जीवन विसंगतियों (ट्रेजेडी ऑफ एरर्स) का अद्भभुत जीवंत नमूना है। तुम सोचो जो आदमी कॉलेज में लेक्चरर बनने के सपने और योग्यता रखता हो (जो लोग बने हैं बनते हैं उनसे कहीं ज्यादा योग्यता--इससे तुम इंकार नहीं कर सकते) वो पुलिस की चूतियापे की नौकरी कैसे करता होगा? तुमने कभी गोल क्वार्टर वाली उनकी दीदी या मां का चेहरा देखा है? बेशक कई बार ऐसा हुआ होगा कि तुम्हे भी खाना नहीं मिला होगा लेकिन रीवा में रहते हुए भूखे रहने की वजह समझ सकते हो? और ऐसा कई बार हुआ है।
    बात सिर्फ योगेन्द्र की नही है राघवेन्द्र भी कम प्रतिभावान नहीं लेकिन देखो किस हालत में है वो? ओम द्विवेदी रीवा में रहते हुए लगभग खत्म हो गए। सोचो अगर वो कहीं दूसरे शहर में होते या हो पाते तो कैसे होते? करीब पांच साल मैंने उनसे कहा था कि आप रीवा छोड़ दीजिए। ये जिनका ब्लॉग है उनके बारे में भी तुम जानते हो। आशीष त्रिपाठी केवल और केवल इसलिए बच पाए क्योंकि वो सेवाराम जी के लड़के थे। क्या इंकार करोगे?
    जानते हो शशि, रीवा से मेरी शिकायत है। वो अपने लोगों को ही मार डालता है। कम से कम तुम तो इस षणयंत्र से बचो यार!

    उत्तर देंहटाएं
  7. विश्वदीपक,मैं किसी षडयंत्र में शामिल नहीं हूँ.आपसे मैं दो बार मिला हूँ.पर हमेशा आपके बारे में जानना चाहता रहा हूँ.होता भी कुछ यूँ था कि मुझे बाक़ायदा सुनाया जाता कि आई आई एम सी से निकले आपकी प्रतिभा के सामने मुझ जैसे जो हमेशा रिमहा ही रहे आएँगे कितने मामूली हैं.कई बार खयाल भी आया कि आपसे संम्पर्क करूँ तो इस बात से डर गया कि आपके प्रशंसक मित्र इसे मेरी नेटवर्किंग की महत्वाकांक्षा न समझ लें.इसके बावजूद मेरे भीतर आपके स्टैंड और तेवर के प्रति एक लगाव है.मैं आपको पढ़ता रहा हूँ.यहाँ भी आपने जिस संतुलन के साथ अपनी बात रखी है उससे मुझे आपकी नीयत पर संदेह करने का कारण नहीं मिला

    फिर भी दोस्त मैंने जो योगेन्द्र जी के बारे में लिखा है उस पर कायम हूँ.क्योंकि यह मेरा अनुभव है.मैंने योगेन्द्र जी को काफ़ी सहा भी है.यहाँ शुरुआत भी उन्होंने ही की थी.जिसे इस रूप में प्रश्रय मिला कि इस ब्लाग में पिछली पोस्ट का जो कुछ अर्थसत्ता से लाया गया है उसमें केवल मेरी एक जवाबी टिप्पणी को छोड़ दिया गया है.मैं उस मासूमियत को बर्दाश्त नहीं कर पाता जिसमें यह समझा जाता है कि हम ही हैं जो समझ लेते हैं और केवल हमें ही चोट भी पहुँचती है.दूसरे मानो काठ के हों.पहले आक्रामक रहो फिर हास्यास्पद बनाओ फिर भी बात न बने तो सामनेवाले का अपराधबोध जगाओ मैं इसे चाल मानता हूँ.खैर

    योगेन्द्र जी के लिए अवसर और ईनाम की कमी रीवा मे कभी नहीं रही.रीवा में जो भी चोटी के बौद्धिक रहे उनका भरपूर प्यार उन्हे मिला.मैं उनसे कम ही रीवा का ठहरूँगा.ठीक उतना ही जितने आप दिल्ली के हो.मैंने रीवा में केवल पढ़ाई की है.रोज़ शाम को मैं अपने गाँवे के लिए निकल जाता था.चाँदनी रात में देर से.अँधेरी रात में अँधेरा होने के पहले.

    इस बार मैंने सिर्फ़ लिख देने की कोशिश की है क्योंकि अब तक होता यह रहा है कि मैं बोलता था और वह अंत में मज़ाक बना दिया जाता था.यहां यह कामना थी कि लिखे हुए को कितना बदलेगा कोई.

    मुझे योगेन्द्र जी की क्षमताएँ पता हैं.उन्हे जो नहीं मिल सका है उससे हम भी वंचित हैं.और व्यक्तिगतरूप से मैं यह सोचता हूँ कि योगेन्द्र जी को हम लोगों से बहुत पहले लेक्चरशिप मिले.हाँ ओम चुके नहीं हैं.उनकी धार वैसी ही है.वे सही ठहरे हैं समय के साथ.देखना हो तो उनके ब्लाग का लिंक यहीं मिल जाएगा.कुछ चालू किस्म की धारणाओं से किसी को सफल-असफल न मानें.
    वे सेल्फमेड पर्सन हैं.अब काफ़ी सक्षम भी.निरीह नहीं.जब मैं उनके सामने होता हूँ तो उनके कमज़ोर पड़ जाने की कल्पना नहीं कर पाता.अपने जवाब में उन्होंने हनुमान चालीसा की चौपाई के बहाने जो कहा है मैं समझ सकता हूँ.

    आपका आज तक चमत्कारी व्यक्तित्व पर यकीन कायम है यह जानना दिलचस्प है.पर मुझे लगता है ऐसे ही भरोसों ने उन्हें आत्ममुग्धता में धकेला है.

    मैं रीवा के किसी हत्यारे गिरोह को नहीं जानता जो उन जैसी प्रतिभा को मार डालने में सक्षम हो.बाक़ी आप समझदार हैं.

    उत्तर देंहटाएं
  8. yogendar ki ghazlon men ek poornata hai.pakke ki taraf badhtee,par geeli mitti se bani ghazalen.sabse pahle is par use badhee deni chahiye.

    yogendra ki pratibha anant hai,saflta to nahin par ant men bat sarthakta ki hogi.yogendra ko ek SATTYA chahiye,jo shayad use nahin mil raha.
    abhi yogendra ko kai anchuee zameenen chune hain,aur kai andekhe aakash dekhne hain,aur uske sath ham bhi dekh sakenge...main hamesha usse kuch ssekhta hun,halanki vah mere chote bhai sa hai.

    badhee.

    उत्तर देंहटाएं
  9. bhai benami,
    himmat ho to apna naam pata likho.vaise mai sheeghra hi pata kar lunga.tumne mere bhai (raghvendra)ke bare me jo likha hai,wo akshamya hai.blog par apne durgandhit adhovastra dhote hue tum bhool gaye ki jo tum kar rahe ho,wo cyber crime ki shreni me aata hai.apne upar maan-haani ka muqadma jhelne ke liye taiyaar raho.tab aamne-saamne baatein ho sakengi.

    उत्तर देंहटाएं
  10. बेनामी भाई,
    ये खाल ओढ़कर दूसरों को पढ़ने-लिखने की सलाह देने यानी ज्ञान चक्षु खोलने का नायाब तरीक़ा कहाँ से सीखा?क्या आप जैसे अध्यात्म समर्थक ज्ञानी को इतना डरपोक होना चाहिए?
    मैं समझ रहा हूं आप साहित्य और रंगमंच की अज्ञात प्रतिभा हैं...शायद निवेदन पर तथा करियर के लिए साथ देनेवाले आप जैसे महत्वाकांक्षियों की यही नियति होती है.आप अपनी हद जानते हैं जानकर अच्छा लगा.पर माफ़ कीजिए किसी की हद के बारे में आपकी समझ बोदा है.आप इस मुगालते में भी लग रहे हैं कि मां-बाप का दिया नाम छोड़ देने से सफलता आपके क़दम चूमेगी साथ ही आपमें वो संतुलन भी अपने आप चला आएगा जिससे इर्ष्या का नामोंनिसान मिट जाता है.
    मुझे आपसे कुछ खास नहीं कहना.हँसी आ रही है आपकी इस छद्म विनम्रता और आपके प्रतिभा मूल्यांकन की योग्यता पर.आप कूपमंडूकता का आशय सचमुच जानते हैं?बिना निर्भय हुए किसी तरह का खुलापन नहीं आता बेनामी भाई.
    आप ब्लागिंग में भी नये ही लगते हैं वरना गूगल के सहारे इतनी भ्रष्ट भाषा लिखने को मजबूर नहीं होते.पर आप हिंदी के विद्वान ठहरे.
    बेनामी भाई,जीवन में साथ देना सीखिए.हमेशा लाभ उठाने की आपकी प्रवृत्ति ने ही इस डरपोक दशा में छोड़ दिया है.आपके बुजुर्ग सरंक्षक पहले ही जान गए थे कि आपसे कोई ढंग का काम नहीं लिया जा सकता जिसके एवज में कोई जूठन डाली जा सके हमेशा फैली हुई आपकी ज़रूरतमंद हथेली पर.

    मैं रोज़गार को सफलता नहीं मानता.मुझे सचमुच खुशी होगी अगर आप रचनात्मकता का साथ देनेवाले अब भी बन सकें.

    शीर्षक का बैंड बजाने की मेरी कोई मंशा नही रही कभी.आप अपने ही प्रयासों से उपजी ऐसी ओछी गुटबाज़ी के नतीज़े न निकालें,न ही दूसरों पर दोष थोपें.
    ज़ाहिर है आप नाम से कभी नहीं आएँगे.और मैं मानहानि की धमकी भी नहीं दे सकता आपको.आप कभी मिलें तो वैसे ही मिलूंगा.पर मैं जान रहा हूँ आप कौन महाशय हैं.आपसे ऐसी ही उम्मीद थी पर आप हमेशा से लेट लतीफ आदमी रहे हैं
    बेनामी भाई,आप अपनी सरस्वती बढ़ाएँ.जो लिखना हो लिखें.मैं दुबारा नहीं आनेवाला इस ब्लाग पर.
    आप यदि व्यक्तिगत-अव्यक्तिगत को लेकर ऐसी ही समझ रखते हैं तो मेरी सलाह है फिक्स रेट की दुकान खोल लीजिए.
    आप भी सफल हों.प्रभु आपको निडरता बख्शे इसी कामना के साथ

    आपका
    शशिभूषण

    उत्तर देंहटाएं
  11. Bahut khoob Yogendra. Tumhari kavitayen/ghazal padhakar bahut achchha lagata hai. Thanks for sharing them with us.

    Dinesh

    उत्तर देंहटाएं

कृपया अपनी राय से अवगत करायें..

Related Posts with Thumbnails