रंग और उजास

रंग और उजास

गुरुवार, सितंबर 09, 2010

नियाज़ हैदर की संगत में.. जावेद सिद्दीकी

शायर, लेखक और रंगकर्मी की तरह नियाज़ हैदर को जानने वाले कुछ लोग तो ज़रूर उन्हें करीब से जानते ही होंगे पर नियाज़ हैदर का नाम नई पीढ़ी के लोगों के लिए हो सकता है कुछ अनसुना सा लगे या फिल्मों के इतिहास और पटकथा, संवादों आदि के बारे में रूचि रखने वाले कुछ लोग उन्हें गहरे से न सही, पर कुछ-कुछ जानते भी हों, फिर भी इतना तो तय है कि परदे के पीछे के लोगों को दुनिया परदे पर आने वालों की तुलना में तो बहुत कम ही जानती है.

“..जब तक भूखा इंसान रहेगा, धरती पर तूफान रहेगा..” नियाज़ हैदर की एक नज़्म की ये दो पंक्तियाँ पिछले कई दशकों से जनआन्दोलनों का प्रिय नारा बनी हुई हैं। वे जितने बीहड़ किस्म के कम्युनिस्ट थे उतने ही प्रकाण्ड विद्वान। सुख सुविधा और अवसरों को ठोकर मारने वाले। यायावर, अन्वेषी तथा ज़बरदस्त सृजनात्मक क्षमताओं से सम्पन्न। शायर, लेखक, रंगकर्मी की हैसियत अपनी जगह, कट्टर किस्म के स्वाभिमानी भी थे एक मामले में नीतिगत असहमति के कारण देश के सबसे मजबूत प्रधानमंत्री से हाथ मिलाने से इंकार कर दिया था। नियाज़ हैदर को करीब से, आत्मीयता से देखते हुए जावेद सिद्दीकी को यहाँ पढ़िए.. वसुधा -85 के सौजन्य से ...


'वसुधा' के अंकों के बारे में और जानने के लिए दायीं तरफ के कॉलम में
"वसुधा के अंक" की लिंक को क्लिक करके आप अन्य प्रकाशित सामग्री की
जानकारी ले सकते हैं , सम्पादकीय पढ़ सकते हैं और 'वसुधा' से संपर्क कर सकते हैं.

बंजारा
जावेद सिद्दीकी

अगर सूट पहने हुए होते और ज़रा थोड़े से गोरे होते तो कोई भी कसम खा लेता कि कार्ल मार्क्स जि़न्दा हो गये हैं। वही झाड़-झन्कार दाढ़ी, वही बड़ा सा सिर, आगे से उड़े बाल और सिर के पिछले हिस्से में खिचड़ी बालों की मोटी झालर जो कानों के ऊपर से लटक कर दाढ़ी में शामिल हो गयी थी। बदन भी कुछ वैसा ही था, यानी छोटे भी थे और मोटे भी। खुदा जाने नियाज़ हैदर ने अपना हुलिया खुद बनाया था या बन गया था। सच्चाई जो भी हो वह देखने में ही निहायत मार्क्सिस्ट लगते थे। मैंने पहली बार नियाज़ हैदर को मुज़फ्फर अली के घर पर देखा था। मैं और शमा ज़ैदी, मुज़फ्फर के जुहू वाले बंगले के खूबसूरत लॉन में बैठे थे जिसमें गद्दे और गाव तकिये लगे थे। गद्दों पर चाँदनियाँ बिछी थीं और रंगीन शीशों वाले दरवाज़ों पर बारीक काम की चिकें पड़ी हुई थीं। मुज़फ्फर सदैव इस बात की कोशिश करते हैं कि उनके घर में दाखिल होने वाला हर शख्स फौरन समझ जाये कि मुज़फ्फर अपना लखनऊ हर जगह अपने साथ लेकर चलते हैं। हमारी ये मुलाकातें लगभग प्रति दिन होती थीं क्योंकि उमराव जान की शूटिंग सिर पर थी और स्क्रिप्ट के नोंक पलक ठीक किए जा रहे थे। अचानक सुभाषिनी ने दरवाजे में से मुंह निकाला और ऐलान किया 'बाबा आ रहे हैं’ बाबा का नाम सुनते ही मुज़फ्फर संभल कर ठीक होकर बैठ गये, आँखों में एक शरारत भरी सी चमक आयी और होटों पर मुस्कुराहट दौड़ गयी। शमा ने सिर टेढ़ा करके दरवाज़े की तरफ देखा और अपना कलम (पेन) बन्द करके थैले में डाल दिया।
बड़ी अहम और गरमा गरम बहस चल रही थी, इसमें इस तरह ब्रेक लगना मुझे अच्छा नहीं लगा। गुस्से में जिस तरह आधा लेटा था उसी तरह लेटा रहा। आये जिसको भी आना है, मुझे क्या?
चिक के पीछे से पहले एक निहायत मोटा सा डण्डा आया और फिर बाबा। खादी का ढीला-ढाला घुटनों तक लम्बा कुर्ता जो पहले कभी लाल रहा होगा मगर धुलते-धुलते बादामी हो गया था। बड़े पायचों का मैला सा पाजामा, कन्धे पर खादी का झोला और मामूली सी दो पट्टी वाली चप्पल। हुलिया वही था जो ऊपर बयान कर चुका हूँ। बाबा ने छोटी-छोटी चमकती हुई आँखों से सबको देखा, गले से हँसी जैसी एक आवाज़ निकाली और बोले 'आहा शमा बीबी भी हैं।‘
शमा ने आदाब किया और कहा 'ये जावेद हैं।‘
मुज़फ्फर ने डण्डा लेकर कोने में रखा और जहाँ खुद बैठते थे वहाँ बैठने का इशारा करते हुए अदब से कहा 'बैठिये बाबा।‘
बाबा ने एक निगाह, जो बज़ाहिर निगाह से कम थी मेरी तरफ डाली, हल्के से सिर हिलाया और गाव तकिये से इस तरह लग कर बैठ गये जैसे मजलिस पढऩे वाले हों। सुभाषिनी अन्दर आ गयीं: 'क्या लेंगे बाबा?’
'भई हमारी माचिस खत्म हो गयी है।‘
'अरे माचिस लाओ!’ मुज़फ्फर ने आवाज़ लगायी। माचिस आई, बाबा ने कुर्ते की जेब से बीड़ी का बन्डल निकाला एक बीड़ी चुनी और माचिस जलाकर पहले बीड़ी को सेंका और फिर सुलगाकर एक लम्बा कश लगाया। फिर बीड़ी को उंगलियों में इस तरह पकड़ लिया जैसे बिस्मिल्लाह खाँ शहनाई पकड़ते हैं, और फरमाया 'कहाँ तक पहुँची कहानी?’ 'स्क्रिप्ट तो पूरी हो गयी है, शहरयार का इन्तेज़ार है, आ जायें तो गाने भी फाइनल हो जायें।‘
'जावेद ने डायलाग बहुत अच्छे लिखे हैं बाबा।‘ मुज़फ्फर ने कहा।
'अच्छा आपने पहले क्या लिखा है मियाँ?’
'शतरंज के खिलाड़ी के डायलाग भी हम दोनों ने लिखे थे।‘ शमा ने बताया।
'बेहूदा फिल्म थी, प्रेमचन्द की कहानी का सत्तिया नास कर के रख दिया जाहिल! हाँ डायलाग ठीक-ठाक थे कम से कम ज़बान की कोई गलती नहीं थी।‘
गुस्से में मेरे होठों तक एक शब्द आया 'ईडियट मगर मुँह से निकला: 'शुक्रिया’
नियाज़ हैदर इधर-इधर की बातें करते रहे और मैं उन्हें घूरता रहा। ये हैं कौन? बातें तो ऐसी कर रहा है जैसे सारा अदब अभी-अभी पीकर आ रहा हो। ढोंगी।
बीच में थोड़ी सी तवज्जो बंट गयी थी, शायद मुज़फ्फर का बेटा शाद आ गया था और बाबा उससे बातें करने लगे थे। मैंने मौका पाकर शमा से पूछा: 'ये कौन हैं शमा?’
'अरे! तुम नहीं जानते, ये नियाज़ बाबा हैं, नियाज़ हैदर’ नियाज हैदर? मैं दिल ही दिल में अपना सिर पकड़ के बैठ गया। मुझे क्या मालूम था कि ऐसे होते हैं नियाज़ हैदर। ये थी बाबा से मेरी पहली मुलाकात।
इसके बाद बाबा से लगातार मुलाकातें होती रहीं। कभी मुज़फ्फर अली के घर पे, कभी शमा के घर पे, कभी कैफी साहब के यहाँ, और कभी पृथ्वी थियेटर पर। और जैसे-जैसे नियाज़ बाबा के साथ मुलाकातें बढ़ीं, मेरी नियाज़ मन्दी भी बढ़ती गई। जैसे-जैसे मैं उनके करीब आता गया या यूँ कहना चाहिए, जैसे-जैसे वह मेरे करीब आते गये मुझ पर राज खुलता गया कि बाबा तो बड़े बा कमाल आदमी हैं। और इस बात पर हैरत और अफसोस भी हुआ कि दुनिया उनके बारे में कितना कम जानती है। बाबा अच्छाइयों और बुराइयों का अजीबो गरीब मजमूआ (संकलन) थे। उनकी बातें सुनकर कभी डर लगता था और कभी अकीदत से सिर झुका लेने को जी चाहता था।
अल्लाह जाने कहाँ तक पढ़ा था, कोई डिग्री विग्री भी थी या नहीं, मगर बहुत कम सब्जेक्ट ऐसे थे जिन पर वह नहीं बोल सकते थे। भाषायें भी बहुत सारी जानते थे। उर्दू, फारसी, अरबी और अंग्रेजी तो जानते ही थे, थोड़ी बहुत संस्कृत, कुछ लैटिन और तेलुगू भी जानते थे। और बोलियों ठोलियों का तो जि़क्र ही क्या, अवधी से लेकर भोजपुरी तक अच्छी तरह समझते थे, बल्कि समझा भी सकते थे। याददाश्त इस $गज़ब की थी कि $खौफ आने लगता था। शायर का नाम लीजिए और कलाम का नमूना हाजि़र है। इ$कबाल उनके पसंदीदा शायर थे। मेरा $ख्याल है उन्हें इकबाल का सारा फारसी और उर्दू कलाम याद था।
बाँग-ए-दरा से ज़र्ब-ए-कलीम तक यूँ मज़े ले लेकर सुनाया करते थे, जैसे अभी रट के आये हों। बाबा के अपने कलाम में भी ल$फ्ज़ों का जो आहंग मिलता था, उनमें इकबाल की गूंज सुनाई देती थी। ये कमज़ोरी थी या खूबी, जानबूझ कर ऐसा करते थे या लाशुऊर (अवचेतन) अपना खेल दिखाता था। कुछ कहा नहीं जा सकता। मैं अक्सर उन्हें छेडऩे के लिये इ$कबाल के खिलाफ कुछ कह दिया करता था। एक बार मैंने कहा: 'इकबाल तो शायर-ए-इस्लाम हैं, मेरी समझ में नहीं आता कि आप और सरदार जाफरी जैसे कट्टर माक्र्सवादी उनकी पूजा क्यों करते हैं?’ बाबा गुस्से में लाल-पीले हो गये और पूरे दो घण्टे का एक बड़ा लेक्चर दिया जिसमें ये साबित किया कि इकबाल तरक्की पसन्द शायर थे।
उनकी फारसी का भी यही आलम था। एक दिन मैंने काआनी (फारसी का एक शायर) के कसीदे का जि़क्र किया जो मैंने मुंशी कामिल के कोर्स में पढ़ा था, और जिसका एक ही शेर याद रह गया था:
बगर दूँ तीरहे अब्र बा आमदा बरुश्द अज़ दरिया
जवाहर खेज़ व गौहर बेज़ व गौहर रेज़ व गौहर ज़ा
सुनते ही बाबा की आँखों में चमक आ गयी, सम्भल कर बैठे, एक हाथ से बालों को ठीक किया, दूसरे हाथ से हवा में बीड़ी लहराई और काआनी का करीब सौ शेर का कसीदा फर-फर सुना दिया। यही नहीं बल्कि इस ज़मीन में उर्फी और नज़ीरी ने भी जो कुछ कहा था वह भी सुना दिया। आप सोच सकते हैं कि क्या हालत हुई होगी। कबीर के दोहे, तुलसी की चौपाइयाँ और गालिब के शेर तो बातों के बीच में पके हुये आमों की तरह टपकते ही रहते थे। बाबा के गैर मामूली हाफ्ज़े (स्मरण शक्ति) और अध्ययन का असर उनकी तहरीर में साफ झलकता है, उन्होंने बहुत कम लिखा मगर जो कुछ भी लिखा खूब लिखा।
जब कुदसिया ज़ैदी ने बरतोल बर्तोल्त के नाटक- काकेशियन चाक सर्किल का अनुवाद- 'सफेद कुण्डली’ के नाम से किया तो गीत नियाज़ बाबा से लिखवाये। इस नाटक में उनके लिखे हुये कई गीत: 'सुन मेरा अफसाना रे भाई, 'चार सूरमा, 'चार जरनैल, चले ईरान, और ‘सिपहइया जल्दी आना, एक ज़माने में फिल्मी गानों की तरह मशहूर हो गये थे। बाबा की लेखनी में भी बड़ा दम-खम था। मुज़फ्फर अली का सीरियल जान-ए-आलम और श्याम बेनेगल की फिल्म 'आरोहण’ में भाषा और बयान पर बाबा की पकड़ का अंदाज़ा किया जा सकता है।
बाबा को किस्से कहानियाँ सुनाने का बड़ा शौक था। खास बात ये थी कि सुनी सुनाई नहीं सुनाते थे। अधिकतर किस्से उनके ऊपर गुज़री हुई घटनाओं या सामने होने वाले वाक्यात होते थे। एक बार उन्होंने एक कम उम्र तवायफ की कहानी सुनाई और इस तरह सुनाई थी कि आज तक मुझे याद है और दिल पर उसका असर भी है।
बाबा ने बताया कि हैदराबाद में नाचने गाने और वैश्यावृत्ति करने वालों के बाज़ार का नाम महबूब की मेंहदी है। और यहाँ एक बड़ी मज़ेदार रस्म होती है, जिसे 'दरीचे की सलामी’ कहा जाता है। जब कोई कमसिन तवायफ इस उम्र को पहुंचती है जब जिस्म के हिस्से उभरने लगते हैं, होंठ मुस्कराने लगते हैं और आँखों में एक शरारत भरी चमक आ आती है तो उसे 'दरीचे की सलामी’ के लिये तैयार किया जाता है। कई दिन पहले से जश्न शुरू होता है। साहिबे-ज़ौक और साहिब-ए-नज़र सरपरस्तों को खबर भिजवायी जाती है, दूर-दूर तक निमंत्रण भेजे जाते हैं। करीबी, रिश्तेदार, पड़ोसी और हम पेशा औरतें जमा होना शुरू हो जाती हैं। रतजगे होते हैं, पकवान पकते हैं, मुसलमान वेश्याओं के कोठों पर मजलिसें और मीलाद शरीफ भी होते हैं। जिस लड़की की रस्म होने वाली होती है उसकी नाक में एक बड़ी सी नथ पहनाकर सात दरगाहों पर ले जाया जाता है फिर उसे दुल्हन बनाया जाता है, हालात के मुताबिक आभूषण, कपड़े पहनाये जाते हैं, फूलों के आभूषणों से सजाया जाता है और जब सूरज के जाने और शमाओं के आँखें खोलने का समय होता है तो कमसिन वैश्या की आरती उतारी जाती है, नज़र का टीका लगाया जाता है। और वह उस दरीचे को जो आगे के जीवन में उसे रोज़ी-रोटी और खुशी देने वाला है, झुककर सात सलाम करती है। और उस झरोखे में बैठकर एक नयी रोशनी में उन असंख्य तमाशबीनों को देखती है जिन में से बहुत से वह होते हैं जिनकी आँखों में दिल होते हैं और बहुत से वह भी होते जिनके पास दिल नहीं होते मगर जेब में माल बहुत होता है और फिर नथ उतारने वालों की बोली लगती है।
बाबा ने जिस लड़की की कहानी सुनाई थी उसका (क्लाइमेक्स) ये नहीं था। उन्होंने कहा कि जब उस लड़की को दरीचे पर लाके बिठाया गया तो वह बहुत देर तक चुपचाप बैठी रही। अचानक वह खड़ी हुई, उसने दरीचे की जाली को हाथ लगाकर अपने माथे से छुआ और एक दम से नीचे छलांग लगा दी। इस बाज़ार में पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था, इसलिये चारों तरफ सनसनी फैल गयी। जिसने सुना वह दौड़ा आया ताकि उस पागल लड़की को देख सके जिसने शोहरत और दौलत के शिखर से कूद कर आत्महत्या करने की कोशिश की थी। वह लड़की मरी नहीं, बच गयी। मगर उसकी टांगें टूट गयी थी। बाद में वह लड़की, लंगड़ी खुर्शीद के नाम से मशहूर हुई और अपने समय में 'महबूब की मेंहदी’ की बेहद मशहूर गानेवालियों में उसकी गिनती होती है।
मुझे बाबा का सुनाया हुआ एक और किस्सा याद आ रहा है।
हुआ यूँ कि बाबा दिल्ली में थे। एक दिन उसका फोन आया और उन्होंने बताया कि वह बम्बई आ रहे हैं। उन्होंने अपनी रवानगी (प्रस्थान) का दिन और तारी$ख बताई और तय किया कि दो दिन बाद मुझसे मुला$कात करेंगे। दो दिन गुज़र गये, चार दिन गुज़र गये, ह$फ्ता होने को आया मगर बाबा का कोई पता नहीं था। मैंने इधर-उधर मालूम किया तो बताया गया कि बाबा आये ही नहीं हैं। मैंने दिल्ली फोन किया तो $खबर मिली कि वह वहाँ से चल चुके हैं। अब हम सब ज़रा परेशान हुए हालाँकि परेशानी की कोई बात नहीं थी क्योंकि वह अक्सर ऐसी हरकतें किया करते थे। निकलते थे कहीं जाने के लिये और पहुंच जाते थे कहीं और। मगर डर यह भी था कि वह ट्रेन में अकेले थे। उन्हें सांस की बीमारी थी, और ब्लड प्रेशर की भी। अगर रास्ते में कुछ हो गया तो क्या होगा, मगर सिवाये सब्र करने और परेशान होने के रास्ता भी क्या था। इसलिये चुप-चाप बैठे रहे और दुआएँ करते रहे कि बड़े मियाँ खैरियत से पहुंच जायें।
कोई दस दिन बाद अचानक शमा के घर पर नुमूदार हुए। मैं और शमा तो उन पर बरस ही पड़े, 'ये कोई तरीका है, अगर बम्बई नहीं आना था तो फोन क्यों किया था? और अगर इरादा बदल गया था तो दूसरा फोन करके क्यों नहीं बताया।‘
बाबा पर हमारी डांट डपट का कोई असर नहीं हुआ। वह बड़े प्यार से मुस्कुराये 'अरे छोड़ो यार! एक अच्छी वाली चाय पिलाओ तो एक ऐसा किस्सा सुनाता हूँ कि इस पर फिल्म बन सकती है।‘
बाबा ने सुनाया कि मेरठ के पास ग्राण्ड ट्रक रोड के पास दोनों तरफ आमने-सामने दो गांव हैं। (गांव का नाम तो अब मुझे याद नहीं रहा) मगर नाम एक ही था, एक गांव छोटा कहलाता था दूसरा बड़ा। जो गांव बड़ा था वह हिन्दुओं का था और छोटे गांव में मुसलमानों की आबादी ज़्यादा थी। वहां कोई सवा सौ साल से एक रस्म अदा की जाती है।
हर ब$करीद पर हिन्दुओं के गांव से एक गाय, कुर्बानी के लिए मुस्लिम गांव में भेजी जाती है। ब$करीद के दिन सवेरे-सवेरे हिन्दू गांव में गाय को सजाया संवारा जाता है, उसकी पीठ पर नयी झोल डाली जाती है, गले में हार होते हैं, सींग और दुम पर रंगीन रिबन और गोटे से सजावट की जाती है। उसकी आरती उतारी जाती है और फिर ये गाय बैण्ड बाजे और सैकड़ों गांव वालों के साथ किसी दुल्हन की तरह, मुसलमानों के गांव लाई जाती है। गांव के मुसलमान गाय का हार फूल से स्वागत करते हैं। साथ ही आने वालों को मिठाईयाँ बाँटी जाती हैं। फिर गाय को एक चबूतरे पर खड़ा कर दिया जाता है, जिसके चारों तरफ सारे गांव वाले जमा हो जाते हैं। गांव का कसाई, गाय की गर्दन पर छुरी रखता है और कलमा पढ़ के हटा लेता है। फूलों से लदी फदी गाय और उसके साथ आने वाले, तोहफे और मिठाईयाँ लेकर अपने गांव वापस आ जाते हैं।
बाबा ने मुझे बताया कि 1857 ई. में जब अंग्रेज हिन्दू और मुसलमानों को लड़ाने के लिए गाय की कुर्बानी का मसला छेड़ रहे थे और जगह-जगह हिन्दू-मुस्लिम झगड़े हो रहे थे उस समय इस छोटे से गांव के जमींदार ने कहा कि हम अपनी गाय कुर्बानी के लिए दे सकते हैं मगर अपनी एकता की कुर्बानी नहीं दे सकते। और तब से यह खूबसूरत रस्म हर साल इसी तरह निभायी जाती है। (किसी पाठक को जी.टी. रोड पर बसे हुये इन दो गांवों के बारे में मालूम हो तो मुझे अवश्य सूचना दें, एहसान मन्द रहूंगा) बाबा को ये कहानी किसी ने ट्रेन में सुनाई थी और वह इस रस्म की सच्चाई मालूम करने उस गांव में जा पहुंचे थे।
बाबा स्वभाव के ऐतबार से काफी बोहेमियन थे। उन्होंने जि़न्दगी भर घर बनाने या घर बसाने की कोई कोशिश नहीं की। वह जीवन की तेज़ धारा में एक तिनके की तरह थे, जो स्वयं को लहरों के सहारे छोड़ देता है। और सदैव एक मंजिल की तलाश में मुब्तिला रहता है। $गालिब ने शायद नियाज़ बाबा के लिए ही कहा था।
रौ में है रक्से उम्र कहां देखिये थके
नै हात बाग पर है, न पा है रकाब में
वह अक्सर कहा करते थे 'मैं तो बंजारा हूँ, खाना बदोश।‘
मेरी समझ में आज तक नहीं आया कि बाबा में क्या खास बात थी, जिसकी वजह से जो भी उनसे मिलता था उन्हीं का हो जाता था। बाबा के चाहने वाले हज़ारों थे और भांति-भांति के थे। सज्जाद ज़हीर से लेकर कुदसिया ज़ैदी तक, मुज़फ्फर अली से लेकर श्याम बेनेगल तक, और शशि कपूर से लेकर शमा ज़ैदी तक।
कभी-कभी एक आध झलकी बाबा के व्यक्तित्व में छुपी हुई, मक्नातीस (चुम्बक) की भी दिखाई दे जाती थी।
एक शाम मैं कोई नाटक देखकर पृथ्वी थियेटर से बाहर निकला देखा कि पत्थर की सीढिय़ों पर बाबा बैठे हुए हैं, और हाथों में बीड़ी सुलग रही है। देखते ही खड़े हो गये, बड़े प्यार से गले लगाया और कहने लगे 'अरे यार जावेद! बहुत अच्छा हुआ जो तुम मिल गये मैं तुम्हीं को याद कर रहा था। दुल्हन कहाँ है? (मेरी बीबी फरीदा) मैंने कहा 'वह तो आज नहीं आयी।‘
कहने लगे 'अरे ये तो बड़ा नुकसान हो गया। मैंने थोड़ा परेशान होते हुए पूछा, 'क्यों क्या हो गया?’ मेरे पूछने पर बोले 'भई दुल्हन जो है, वह हमारी खजांची है। जब कभी पैसों की ज़रूरत होती है। उससे ले लेते हैं। तुम्हारे पास तो होंगे नहीं।‘ मैंने कहा थोड़े बहुत हैं आपको कितने चाहिये?’ कहने लगे 'हमें तो एक पैसा भी नहीं चाहिये बस- शराब पीनी है अगर पिला सको तो पिला दो अल्लाह भला करेगा।‘
मैं और बाबा पृथ्वी थियेटर से बाहर निकले, वहीं करीब में एक बार था उसमें घुस गये। बार का बंगाली मालिक लपकता हुआ आया, बाबा की खैर-खैरियत पूछी, फिर दरियाफ्त किया 'क्या पियेंगे?’
बाबा ने बड़ी अदा से किया 'व्हिस्की!’ बंगाली कुछ परेशान हो गया 'व्हिस्की?’
बाबा मुस्कराये और बोले 'आज जावेद मियाँ पिला रहे हैं इसलिये ठर्रा नहीं पियेंगे।‘
बंगाली परेशानी से इधर-उधर देखता रहा फिर धीरे से बोला 'बाबा आज व्हिस्की ठर्रा कुछ नहीं मिल सकता। क्यों नहीं मिल सकता? 'ड्राई डे है बाबा!’ बंगाली ने कहा, बाबा परेशान हो गये, 'अब इस सरकारी कमीनेपन को क्या कहा जाये कि जिस लीडर की याद में ड्राई डे रखा गया है वह बहुत बड़ा आदमी था, उसकी मौत का गम दूर करने के लिये शराब से बढ़कर कोई चीज़ नहीं हो सकती मगर इन गधों को कौन समझाये कि जिन्हें प्यासा मार रहे हैं वह मरने वाले को याद नहीं करेंगे, फरियाद करेंगे।Ó
बंगाली सिर खुजाता हुआ चला गया, मैंने पूछा, 'अब?Ó थोड़ी देर सोचते रहे फिर पूछा, 'क्या बजा है? मैंने कहा: दस बज रहे हैंÓ। कहने लगे: चलो कैफी के घर चलते हैं। वह पी रहा होगा।‘ हम दोनों पैदल चलते हुए जानकी कुटीर पहुंचे और कैफी साहब के दरवाज़े पर लगे हुए जहाँगीरी घण्टे की रस्सी खींची।
घण्टा देर तक बजता रहा मगर कोई गेट खोलने नहीं आया। मैंने कहा बाबा अंदर अंधेरा है लगता है कैफी साहब बाहर गये हैं, बाबा ने उचक कर अंदर झांका, अपने मोटे से डण्डे से लकड़ी के गेट को ठोंका और फरमाया, 'कमरा बंद करके बैठा होगा आज ज़रा सर्दी है ना!’ देर तक घण्टा बजाने के बाद एक नौकर आँखें मलता हुआ नुमूदार हुआ और गेट खोले ब$गैर ही कहने लगा, 'साहब और आपा बाहर गये हुए हैं’, 'कब आयेंगे?’ 'ये तो मालूम नहीं’
बाबा कुछ झुँझला से गये। धीरे-धीरे आगे बढ़े, अचानक आँखों में चमक आयी, कहने लगे, 'आदिल’। विश्वामित्र आदिल का घर सामने ही था मगर उनके बरामदे में भी एक नन्हा सा बल्ब जल रहा था जिससे मालूम होता था कि वह लोग भी नहीं हैं।
बाबा ने सिर हिलाया 'ये भी नहीं है। लगता है कैफी के साथ गया होगा।‘ मैंने घड़ी देखी ग्यारह बजने वाले थे, पृथ्वी की भीड़ भी जा चुकी थी। मैंने बाबा की तरफ देखा अचानक रुके। कहने लगे, 'रिक्शा पकड़ लो, मज़रूह साहब के घर चलते हैं। ज़रा कंजूस ज़रूर हैं मगर इतने कंजूस भी नहीं हैं, कि घर आये मेहमानों को दो पैग न पिला सकें चलो-चलो जल्दी करो।‘
मज़रूह साहब का बंगला जुहू के दक्षिणी किनारे पर लगभग आखिरी बंगला था। लेकिन ज़्यादा दूर नहीं था इसलिये जल्दी से पहुंच गये।
घण्टी बजाई, दरवाज़ा खुला, फिरदौस भाभी ने बड़े तपाक से बाबा का स्वागत किया और ड्राइंग रूम में बिठाया। बाबा के चेहरे की मुस्कुराहट कह रही थी, 'देखा आखिर कामयाबी ने कदम चूम ही लिये।‘
फिरदौस भाभी ने पूछा, 'क्या पियेंगे नियाज़ भाई?’ 'मज़रूह कहाँ है?’ बाबा ने पूछा। 'सुबह से बुखार है, सो गये हैं।‘ बाबा का चेहरा देखने लायक था। वह कभी मुझे देखते थे कभी सामने खड़ी फिरदौस भाभी को। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह दिल की बात ज़बान पर लायें या न लायें। अचानक वह खड़े हो गये, 'आदाब कह देना’ और जवाब का इंतज़ार किये बगैर बाहर निकल आये। तब तक रात के बारह बज रहे थे। और हम दोनों जुहू तारा की सड़क पर उन लुटे हुए मुसाफिरों की तरह चल रहे थे जिस के पास न सिर छिपाने का ठिकाना होता है और न कोई उम्मीद!
बड़ी हिम्मत करके मैंने कहा, 'बाबा मैं निकल जाऊँ? कुर्ला पहुंचना है सान्ताक्रूज़ से आखिरी बस मिल जायेगी।‘
बाबा वहीं बीच सड़क पर रुक गये और गरज कर बोले, 'बिल्कुल नहीं! अब तो जि़द आ गयी है जब तक पी नहीं लेंगे तब तक न आप कहीं जायेंगे और न हम।‘
मैं बोल भी क्या सकता था। एक तो अकीदत ऊपर से यह खौफ कि बड़े मियाँ को अकेला छोड़ दिया तो खुदा जाने कहाँ जायें, क्या करें, इसलिये चुप-चाप चलता रहा। चलते-चलते हम लोग जुहू बीच के पास आ गये तब तक बाबा की सारी बीडिय़ाँ खत्म हो चुकी थीं, और सारी गालियाँ भी! अचानक उनके चेहरे से ऐसी रौशनी फूटी जैसे साठ वाट का बल्ब जल गया हो। बहुत ज़ोर से मेरी कमर पर हाथ मारा और कहा, 'वापस।‘ जुहू कोली बाड़ा और उसके आस-पास बहुत सी छोटी मोटी गलियाँ हैं बाबा ऐसी एक गली में घुस गये। दूर-दूर तक अंधेरा था, दो बल्ब जल रहे थे मगर वह रौशनी देने के बजाये तन्हाई और सन्नाटे के एहसास को बढ़ा रहे थे। बाबा थोड़ी दूर चलते फिर रुक जाते, घरों को गौर से देखते और आगे बढ़ जाते।
अचानक वह रुक गये, सामने एक कम्पाउण्ड था जिसके अंदर दस-बारह घर दिखाई दे रहे थे। इनमें से कोई भी घर एक मंजि़ल से अधिक नहीं था और बीच में छोटा सा मैदान पड़ा था जिसमें एक कुआँ भी दिखाई दे रहा था। बाबा ने कहा 'यही है’ और गेट के अंदर घुस गये। मैं भी पीछे-पीछे था मगर डर रहा था कि आज ये हज़रत ज़रूर पिटवायेंगे। बाबा कम्पाउण्ड के बीच में खड़े हो गये। चारों तरफ सन्नाटा था। किसी घर में रौशनी नहीं थी। बाबा ने ज़ोर से आवाज़ लगाई, 'लारेन्स-लारेन्स’ अचानक एक झोपड़े नुमा घर में रोशनी जली, दरवाज़ा खुला और एक लम्बा-चौड़ा बड़ी सी तोंद वाला आदमी बाहर आया, जिसने एक गंदा सा नेकर और एक धारीदार बनियान पहन रखा था।
जैसे ही उसने बाबा को देखा एक अजीब सी मुस्कुराहट उसके चेहरे पर फैल गयी, 'अरे बाबा। किधर है तुम? कितना टाइम के बाद आया है?’ ये कहते-कहते उसने बाबा को दबोच लिया और फिर ज़ोर-ज़ोर से गवानी भाषा में चीखने लगा। उसने बाबा का हाथ पकड़ा और अंदर की तरफ खींचने लगा, 'आओ आओ अंदर बैठो, चलो, चलो’ फिर वह मेरी तरफ मुड़ा 'आप भी आओ साब! आजाओ आजाओ अपना ही घर है।‘ हम तीनों एक कमरे में दाखिल हुए जहां दो तीन मेज़ें थीं, कुछ कुर्सियाँ और एक सोफा। अंदर एक दरवाज़ा था जिस पर परदा पड़ा हुआ था। बाबा पूछ रहे थे, 'कैसा है तू लारेन्स? माँ कैसी है? बच्चा लोग कैसा है?’
इतनी देर में अंदर का परदा खुला और बहुत से चेहरे दिखाई देने लगे। एक बूढ़ी औरत एक मैली सी मैक्सी पहने बाहर आई और बाबा के पैरों पर झुक गई। बाबा ने उसकी खैर खैरियत पूछी, बच्चों के सिर पे हाथ फेरा और जब ये हंगामा $खत्म हुआ तो लारेन्स ने पूछा, 'क्या पियेंगे बाबा?’
'व्हिस्की!’ बाबा ने कहा
लारेन्स अंदर गया और विहस्की की एक बोतल टेबिल पे ला के रख दी। इसके बाद दो गिलास थे, कुछ चने कुछ नमक, सोडे और पानी की बोतलें। बाबा ने पैग बनाया, लारेन्स अलादीन के जिन की तरह हाथ बांध कर सामने खड़ा हो गया, 'और क्या खाने का है बाबा? माँ मच्छी बनाती, और कुछ चाहिये तो बोलो कोमड़ी (मुर्गी) खाने का मूड है?’ बाबा ने मुझ से पूछा, 'बोलो बोलो भई क्या खाओगे?’
मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि बाबा की इतनी आव भगत क्यों हो रही है। अगर ऐसा भी होता कि वह लारेन्स के मुस्तिकल ग्राहकों में से एक होते तो भी रात के दो बजे ऐसी खातिर तो कहीं नहीं होती। यहां तो ऐसा लग रहा था जैसे बाबा अपनी ससुराल में आ गये हों।
थोड़ी देर में मछली भी आ गयी, उबले हुए अण्डे भी और पाव भी। बहरहाल मुझसे बरदाश्त नहीं हुआ, खाना खाते हुए मैंने बाबा से पूछा, 'बाबा अब इस राज़ से पर्दा उठा दीजिए कि इस लारेन्स और उसकी माँ से आपका क्या रिश्ता है?’
कहानी ये सामने आई कि वर्षों पहले जब बाबा अपनी हर शाम लारेन्स के अड्डे पर गुज़ारा करते थे तो एक दिन जब लारेन्स कहीं बाहर गया हुआ था तो उसकी माँ के पेट में दर्द उठा था, दर्द इतना तेज़ था कि वह बेहोश हो गयी थी। उस वक्त बाबा उसे अपने साथ लेकर अस्पताल पहुंचे, पता लगा कि अपेंडिक्स फट गया है, केस बहुत सीरियस था ऑपरेशन उसी वक्त होना था वरना मौत यकीनी थी। बाबा ने डॉक्टर से कहा आप ऑपरेशन की तैयारी कीजिये और न जाने कहां से और किन दोस्तों से पैसे जमा करके लाये, बुढिय़ा का ऑपरेशन कराया और जब लारेन्स अस्पताल पहुंचा तो उसे खुश खबरी मिली कि उसकी माँ मौत के दरवाजे पे दस्तक दे वापस आ चुकी है।
............ थैंक्स टु नियाज़ बाबा................
इस कहानी में एक खास बात ये है कि लारेन्स और उसकी माँ के बार-बार खुशामद करने के बाद भी बाबा ने वह पैसे कभी वापस नहीं लिये जो उन्होंने अस्पताल में भरे थे।
सुबह तीन बजे के करीब जब बाबा को लेकर बाहर निकल रहा था तो मैंने पलट कर देखा था, लारेन्स की माँ अपनी आँखें पोछ रही थी और लारेन्स अपने हाथ जोड़े सिर झुकाये इस तरह खड़ा था जैसे किसी चर्च में खड़ा हो। बाबा का एक मज़ेदार किस्सा हरी भाई (संजीव कुमार) ने मुझे सुनाया था।
जब तक विश्वामित्र आदिल बम्बई में रहे हर साल इप्टा की 'दावत-ए-शीराज़Ó उनके घर पर होती रही। हर नया और पुराना इप्टा वाला अपना खाना और अपनी शराब लेकर आता था और इस महफिल में शरीक होता था। सारी शराब और सारे खाने एक बड़ी सी मेज़ पर चुन दिये जाते और जिसका जो जी चाहता खा लेता और जो पसन्द आता वह पी लेता। ये एक अजीबो गरीब महफिल होती थी। जिसमें गाना, बजाना, नाचना, लतीफे, चुटकुले, ड्रामे सभी कुछ होता था। और बहुत कम ऐसे इप्टा वाले होते जो इसमें शरीक न होते हों। ऐसी ही एक 'दावते शीराज़Ó में हरी भाई नियाज़ बाबा से टकरा गये और जब पार्टी खत्म हो गई तो अपने साथ अपने घर ले गये। हरी भाई देर से सोते थे और देर से जागते थे। इसलिये वहाँ भी सुबह तक महफिल जमी रही। पता नहीं किस समय हरी भाई सोने के लिये चले गये और बाबा वहीं कालीन पे लेट गये। दूसरे दिन दोपहर में हरी भाई सोकर उठे और रोज़ाना की तरह तैयार होने के लिए अपने बाथरूम में गये। मगर जब उन्होंने पहनने के लिए अपने कपड़े उठाने चाहे तो हैरान हो गये, क्योंकि वहाँ बाबा का मैला कुर्ता पाजामा रखा हुआ था और हरी भाई का सिल्क का कुर्ता और लुंगी $गायब थे।
हरी भाई ने नौकर से पूछा तो यह बात मालूम हुई कि वह मेहमान जो रात को आये थे सुबह सवेरे नहा धोकर सिल्क का लुंगी कुर्ता पहन के रु$ख्सत हो चुके हैं।
कहानी यहाँ $खत्म नहीं होती है।
इस कहानी का दूसरा हिस्सा ये है कि कोई दो महीने बाद एक दिन अचानक नियाज़ बाबा हरी भाई के घर जा धमके और छूटते ही पूछा, 'अरे यार हरी! पिछली दफा जब हम आये थे तो अपना एक जोड़ा कपड़ा छोड़ गये थे वह कहाँ है?’ हरी भाई ने कहा, 'आपके कपड़े तो मैंने धुलवा के रख लिये हैं मगर आप जो मेरा लुंगी कुर्ता पहन के चले गये थे वह कहाँ है?’
बाबा ने बड़ी मासूमियत से अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरा, सिर खुजाया और बोले, 'हमें क्या मालूम तुम्हारा लुंगी कुर्ता कहाँ है? हम कोई एक जगह कपड़े थोड़ी बदलते हैं?’
हरी भाई जब भी ये किस्सा सुनाते थे बाबा का जुमला याद करके वे बेतहाशा हंसने लगते थे। बाबा के छोटे-मोटे चुटकुले तो इतने हैं कि किताब तैयार हो सकती है। मगर चलते-चलते एक ऐसा किस्सा सुन लीजिए जिससे उनके व्यक्तित्व के एक और पहलू पर प्रकाश पड़ता है।
एक दिन बाबा मिले तो बहुत खिले-खिले से थे, कुछ धुले-धुलाये भी लग रहे थे। मैंने वजह पूछी तो कहने लगे, 'अरे तुम्हें नहीं मालूम श्याम हम से अपनी फिल्म लिखवा रहा है।‘
पूछा, 'श्याम कौन?’
कहने लगे, 'ओफ्फोह श्याम बेनेगल और कौन? भई बहुत अच्छा आदमी है। जितना अच्छा डायरेक्टर है उससे भी ज़्यादा अच्छा इंसान है। उसने हमें अपने आफिस में एक मेज दे दी है और होटल में खाने का प्रबन्ध कर दिया है। सुबह जाते हैं तो मेज़ पर बीड़ी के दो बण्डल और माचिस भी मिलती है। और चाय तो दिन भर आफिस में बनती रहती है और क्या बतायें, हम आजकल ऐश कर रहे हैं।‘
मैंने बाबा को मुबारक बाद दी और दबी जुबान से कहा, 'आपको अपनी सलाहियत दिखाने का बेहतरीन मौका मिला है इसे बीच में छोड़ के भाग मत जाइयेगा जैसा कि आपकी आदत है।‘
कुछ दिन बाद की बात है, मैं शमा के घर बैठा हुआ था। हम दोनों किसी स्क्रिप्ट पर काम कर रहे थे कि अचानक आ धमके। न जाने कहाँ से आ रहे थे, बुरी तरह हांफ रहे थे और काफी उजड़े-उजड़े लग रहे थे। जब पानी वानी पी चुके थे तो हमने खैरियत पूछी, फरमाया, 'अजीब आदमी है बात को समझता ही नहीं है। अरे दो वक्त खाने और दो बण्डल बीड़ी से जि़न्दगी थोड़ी गुज़र सकती है।‘ शमा ने पूछा, 'क्या श्याम ने कुछ कह दिया बाबा’
'अरे कहे तो तब, जब सुने। वह सुनता ही नहीं।‘
'क्या नहीं सुनता।‘ मैंने पूछा
'अरे भई हमें पैसे की ज़रूरत पड़ती है और भी तो पचास ज़रूरतें हैं कि नहीं?’
शमा ने कहा, 'मगर ये बात तो मेरे सामने तय हुई थी कि आपको कैश नहीं दिया जायेगा, क्योंकि आप उसकी शराब पी डालेंगे! और काम अधूरा छोड़कर चले जायेंगे। बाबा, गुस्से में लाल हो गये, बीड़ी जो अभी-अभी सुलगाई थी उसे चाय की प्याली में बुझा दिया और गरजकर बोले, 'कैसे बातें करती हो शमा बीबी। हमारी शराब से हमारे काम का क्या ताल्लुक है? तुम ने तो देखा था बेगम साहिबा (बेगम कुदसिया ज़ैदी, शमा ज़ैदी की वालिदा) के लिये हमने कितना काम किया। क्या उन्होंने हमारी शराब बन्द करवाई थी?’
शमा अचानक बहुत ज़ोर से हंसी और मेरी तरफ मुड़ के बोली, 'तुम को मालूम है जावेद! हमारी अम्मा उनसे कैसे काम करवाती थी। इन्हें कमरे में बन्द कर देती थीं और खिड़की के बाहर उनकी पहुंच से दूर एक बोतल रख दिया करती थीं और कहती थी कि काम खत्म करोगे तभी ये बोतल तुम्हारे पास आयेगी। ये बहुत चीखते थे मगर हमारी अम्मी पर उनकी किसी बात का कोई असर नहीं होता था।‘
बाबा को भी पुराने दिन याद आ गये, 'बहुत ज़ोर से कहकहा लगाया और फरमाया, 'तो हम कहाँ कहते हैं कि काम के बीच में पीयेंगे मगर शाम के लिये तो पैसे मिलने ही चाहिये। पैसों पर हमें याद आया, अरे भाई बाहर एक टैक्सी खड़ी है उसका किराया भिजवा देना!’
मैं बाहर निकला, टैक्सी वाले से पूछा, 'किराया कितना हुआ?Ó
कहने लगा, 'एक सौ सत्तर रुपये’
'एक सौ सत्तर?’ मैंने हैरान होकर पूछा।
टैक्सी वाला बाहर निकल आया, 'आप खुद देख लो साब! मीटर अभी तक चल रहा है।‘ मुझे मालूम था कि बाबा वरली पर एक गेस्ट हाउस में रहते हैं मगर ये वह ज़माना था जब वरली से जुहू तक का टैक्सी का किराया पच्चीस तीस रुपये होता था, इसलिये एक सौ सत्तर सुनकर मेरी हैरत ठीक थी।
मीटर भी झूठ नहीं बोल रहा था, मगर ये कैसे हो सकता है। मैंने कहा, 'मगर मेरे भाई वरली से यहाँ तक इतने बहुत से पैसे कैसे हो सकते हैं?’ टैक्सी वाला चिढ़ गया, 'क्या बात करते हैं साब? सवेरे नौ बजे गाड़ी पकड़ी थी, किधर-किधर जाके आये हैं, साब मजगांव, माहिम, बान्द्रा और सब जगह पे मेरे को रोक के रखा।‘
मैं समझ गया और मैंने चुप-चाप एक सौ सत्तर रुपये अदा कर दिये मगर गुस्सा बहुत आया। ये क्या तरीका है, जेब में पैसे नहीं तो टैक्सी में घूमने की क्या ज़रूरत है, मगर वह ऐसी छोटी-छोटी बातों की परवाह करते तो नियाज़ हैदर काहे को होते।
श्याम बाबू को बुरा भला कहने का जो सिलसिला शुरू हुआ वह कई महीनों जारी रहा। जब भी मिलते बेनेगल की शान में ऐसे $कसीदे पढ़ते कि लिखे नहीं जा सकते। शिकायत एक ही थी कि बाबा के चीखने चिल्लाने डराने धमकाने और खुशामद के बावजूद श्याम बेनेगल ने उन्हें पैसे नहीं दिये थे।
फिर एक दिन यूँ हुआ कि मैं रोजाना की तरह शमा के घर बैठा हुआ था जो एक तरीके से हमारा आफिस बन चुका था। एम.एस. सथ्यू भी बंगलौर से आये हुए थे और कुछ बहुत मज़ेदार बातें हो रही थीं कि बाबा प्रकट हो गये। उस दिन भी वह हांफ रहे थे और पसीने में तर थे। आते ही उन्होंने अपनी फूली हुई सांसों में श्याम को बुरा भला कहना शुरू कर दिया, 'मुझे आज तक किसी ने इतना परेशान नहीं किया जितना इस आदमी ने किया है। मेरी समझ में इसकी कोई भी बात नहीं आती।‘
'अब क्या कर दिया श्याम ने?’ शमा कुछ उखड़ सी गयीं।
बाबा बैठे से खड़े हो गये, जेब में हाथ डाला और दस हज़ार रुपये निकाल कर बोले, 'ये देखो इस नालायक आदमी ने ये रुपये मुझे थमा दिये। अब तुम बताओ मैं इनका क्या करूँ?’
हम तीनों एक दूसरे का मुँह देखने लगे। क्या आदमी है भई, नहीं मिला था तो भी नाराज़ और अब मिलने पर भी नाराज़। शमा ने कहा, 'ये आपके काम की मेहनत है खर्च कीजिए!’ 'वही तो पूछ रहा हूँ कहाँ खर्च करूँ?’ बाबा ने पूछा। सथ्यू ने अपनी दाढ़ी खुजाई और कुछ सोचते हुए बोले 'आपको किसी चीज़ की ज़रूरत नहीं है क्या?’ बाबा ने कहा, 'ऐसी कोई ज़रूरत नहीं है कि इतने बहुत से पैसों की ज़रूरत पड़े।‘ शमा ने राय दी, 'सबसे पहले तो आप अपने लिये कुछ कपड़े बनवा लीजिए’
बाबा खुश हो गये, कहने लगे, 'हाँ ये बहुत अच्छी बात है। हमारे पास दो ही कुरते रह गये हैं।‘
'और कुछ’ सथ्यू ने पूछा।
वह कुछ देर सोचते रहे फिर बोले, 'हैदराबाद में मेरी एक बहन रहती हैं, अगर किसी सूरत से उनका पता मालूम हो सके तो एक हज़ार रुपये उनको भिजवा दूँ। 'और कुछ?’ 'और कुछ नहीं।‘
'तो एक काम करते हैं।‘ सथ्यू ने कहा, 'हज़ार बहन के, पन्द्रह सौ कपड़े के और ये बाकी के साढ़े सात हज़ार रुपये बैंक में जमा करा देते हैं।‘
'मगर बैंक में तो हमारा खाता नहीं है।‘ 'ये कौन सी बड़ी बात है?’ सथ्यू ने कहा 'चलिये उठिये।‘
सथ्यू बाबा को लेकर अपने बैंक में गये और पूरे साढ़े सात हज़ार रुपये जमा करके बाबा को भी सरमायादारों की फेहरिस्त में खड़ा कर दिया। आपको लग रहा होगा कि ये दिलचस्प कहानी यहाँ खत्म हो गयी। जी नहीं! इसका आिखरी हिस्सा बाकी है।
इस घटना के कोई तीन महीने बाद एक दिन दोपहर बाद नियाज़ बाबा शमा के घर में इस तरह दाखि़ल हुए कि उनके आगे-आगे एक दस ग्यारह बरस का लड़का उनका झोला और डण्डा उठाये हुए चल रहा था और पीछे एक पतली-दुबली खादी की सफेद साड़ी में लिपटी हुई सांवली सी लड़की थी जिसकी उम्र सत्ताईस से अधिक न होगी।
ये बात तो फौरन समझ में आ गयी कि अपना वजन उठाने के लिये बाबा ने एक छोकरा रख लिया है मगर ये लड़की कौन है? जो खादी की सफेद साड़ी में कांग्रेस सेवा दल की वर्कर मालूम होती है। वह लड़का तो बाबा का सामान रख के किचन की तरफ िखसक गया, बाबा खुद दीवान पर फैल कर बैठ गये और लड़की से कहने लगे, 'जाओ-जाओ तुम अंदर चली जाओ और आराम करो, बहुत थक गयी हो।‘
वह लड़की भी बगैर एक शब्द कहे हुए शमा के बेडरूम में गयी और बिस्तर पर जाके लेट गयी।
दिल में तरह-तरह के $ख्याल आ रहे थे। कहीं अनहोनी तो नहीं हो गयी, बड़े मियाँ ने इस उम्र में किसी का हाथ तो नहीं थाम लिया। मुझे बाबा की हालत भी बेहतर लग रही थी, कपड़े साफ सुथरे थे और इस्तरी किये हुए थे, दाढ़ी और बालों पर कैंची चलने के आसार दिखाई दे रहे थे। चेहरे पर वैसी ही चमक थी जैसी पुराने पीतल पे पालिश करने के बाद आती है। हद तो ये थी कि उनके गंदे मैले नाखून भी कटे हुए थे।
बाबा थे कि लहक-लहक कर इधर-उधर की बातें कर रहे थे मगर मेरे दिमाग में वही लड़की घूम रही थी जो अंदर सो रही थी। जब सस्पेंस बहुत अधिक बढ़ गया तो शमा ने मुझे इशारा किया और मैंने पूछ ही लिया, 'बाबा ये साहिबज़ादी कौन हैं?’
'ये! ये मेरी मीरा है। बहुत पढ़ी लिखी लड़की है, इसने हिन्दी, इंगलिश और संस्कृत में एम.ए. किया है। ट्रिपल एम.ए. है।‘
'मगर आपके साथ?’
बाबा ने शमा को इस तरह घूरा जैसे उन्होंने कोई बहुत ही बेहूदा सवाल किया हो।
बोले, 'सिक्रेटी है मेरी’
'सिके्रटी’ हम दोनों को हैरत का ऐसा झटका लगा कि कुछ बोला ही नहीं गया।
बाबा बड़े प्यार से बता रहे थे, 'दिल्ली में मिली थी, मैं अपने साथ ले आया। सारा डिक्टेशन लेती है, नोट्स भी बनाती है, इसकी वजह से काम बहुत आसान हो गया है।‘ पता चला कि बात सिर्फ सिक्रेट्री तक ही महदूद नहीं है, बाबा ने एक मराठी फैमिली को भी अपने साथ रख लिया है जिसका बेटा बाबा का झोला डण्डा उठा के चलता है और बच्चे के माँ-बाप बाबा के खाने कपड़े और दूसरी आवश्यकताओं के इंचार्ज बने हुए हैं।
दूसरे शब्दों में इन दिनों बाबा बहुत ही बेहतर जि़न्दगी गुज़ार रहे थे।
इस मुलाकात को सिर्फ तीन माह गुज़रा कि एक दिन बाबा फिर अपने पुराने हुलिये में दिखाई दिये। वही झाड़-झंकाड़ दाढ़ी, उलझे हुए बाल और मैले कपड़े। आते ही फरमाया, ज़रा टैक्सी का किराया भिजवाना।
किराया अधिक नहीं था इसलिये चुप-चाप दे दिया गया। फिर बाबा से पूछा गया कि गर्दिश-ए-अय्याम (परेशानी के दिन) पीछे की तरफ कैसे दौड़ गयी? वह आपके नौकर चाकर और वह सिक्रेट्री कहाँ हैं? कुछ नाराज़ से हो गये, कहने लगे 'चली गयी।‘ पूछा, 'कहाँ चाले गयी?’
कहने लगे, 'मुझे क्या मालूम? दो महीने तनख्वाह नहीं मिली तो मीरा भी चली गई।‘
शमा ने कहा, 'पैसे तो थे आपके बैंक में?’ बाबा कुछ ज़्यादा ही नाराज़ हो गये, 'कैसी बातें करती हो बीबी? साढ़े सात हज़ार रुपये में इतनी बरकत थोड़ी होती है कि हज़ार रुपये महीने की सिक्रेट्री और पन्द्रह सौ रुपये महीने के नौकर रखे जा सकें।‘
शराब बाबा की बहुत सी कमज़ोरियों में से एक थी। जैसे मिले, जितनी मिले, जहाँ भी मिले, मिलनी चाहिए। हैरत की बात ये थी कि वह ठर्रा पीयें या स्कॉच, उन्हें नशा नहीं होता था। या यूँ कहना चाहिये कि कम से कम मैंने उन्हें कभी नशे में नहीं देखा। हालाँकि पीने बैठते थे तो अच्छी खासी पी लिया करते थे और पिलाने वाले को टोकते भी जाते थे, 'कल के लिए कर आज न कंजूसी शराब में।‘
मुहर्रम के दस दिन छोड़ के हर रोज़ शाम को मुम्बई वालों के अनुसार उनकी घण्टी बज जाया करती है और फिर वह तब तक दम न लेते थे जब तक सागर व मीना उनके सामने न आ जाये।
अब कोई पूछे कि नियाज़ हैदर जैसा नास्तिक मुहर्रम क्यों मानता था? और दस दिन तक काले कपड़े क्यों पहनता था। तो मेरे पास इसका जवाज़ (तर्क) है, न जवाब। मैं तो बस यही समझता हूँ कि नियाज़ बाबा का व्यक्तित्व जिन विरोधाभासों के ताने बाने से तैयार किया गया था, ये अमल भी उसका एक हिस्सा था।
एक शाम मैंने डरते-डरते पूछ ही लिया, 'जब आप पर असर ही नहीं होता है तो पीते क्यों हैं?’
मुस्कराये, और बोले,
मय से गरज़ निशात है किस रू सियाह को
यक गोना बे खुदी मुझे हर रात चाहिये।
मैंने कहा, 'लीवर खराब करने से क्या फायदा? आपको नशा तो होता ही नहीं है जिसके लिये लोग शराब पीते हैं’
बाबा बहुत फलसफयाना मूड में थे। कहने लगे, 'ब्रादर! नशा इंसानी दिमाग की एक कैिफयत का नाम है, ये किसी चीज़ में नहीं होता और ये बात मुझसे अधिक कोई और नहीं जानता। क्योंकि ऐसा कोई नशा नहीं हैं, सिवाये एक के, जो मैंने नहीं किया बल्कि मथुरा के साधुओं के साथ बैठकर धतूरे के लड्डू खा चुके हैं और निहंग सरदारों के साथ पत्थर पर संखिया की लकीरें खींच कर उन्हें ज़बान से चाट चुके हैं।
'संखिया? ये न थी हमारी िकस्मत कि विसाले-यार होता। फिर ज़रा विस्तार से बताया कि संखिया चाटना हर ऐरे-गैरे के बस का नहीं।
पत्थर पर संखिया से लकीरे खींच दी जाती हैं जो तीन से पांच इंच लम्बी होती हैं। इस नशे के शौकीन अपनी आवश्यकता और क्षमता के हिसाब से इन लकीरों को ज़बान से चाट लेते हैं। अधिकतर लोग तीसरी लकीर तक पहुंचते-पहुंचते ढेर हो जाते हैं। सुना है कि कुछ सूरमा सात लकीरों का रिकार्ड भी बना चुके हैं।
'कैसा होता है संखिया का नशा?’
'किसी भी नशे को बयान करना बड़ा मुश्किल काम है। क्योंकि शब्द एहसास को बयान नहीं कर सकते।‘ 'और वह कौन सा नशा है जो आपने नहीं किया?’
'कुछ लोग नशे के लिए अपने आप को सांप से डसवाते हैं। मगर मैं ये हरकत कभी नहीं कर सकता।‘, 'क्यों? क्या आपको सांपों से डर लगता है?, 'डर तो नहीं लगता मगर बहुत गंदे लगते हैं।, 'बहुत से लोग तो आस्तीनों में सांप रखते हैं? 'वह भी बहुत गंदे होते हैं।
तो ऐसे थे हमारे नियाज़ बाबा!

1988 ई. में बाबा दिल्ली में थे,
एक दिन फोन आया, बहुत जोश में थे कहने लगे 'जावेद मियाँ। हमें मकान मिल गया है, हमारा अपना मकान अरे सरकार ने दिया है भाई! तुम दिल्ली आओ तो हमारे ही पास ठहरना, बल्कि एक काम करो तुम और शमा आजकल जिस स्क्रिप्ट पर काम कर रहे हो उसे लेकर आ जाओ। बड़ी मज़ेदार सर्दियाँ हैं, अंगीठी जल रही है, शराब भी चल रही है मगर कोई दोस्त पास नहीं है। बल्कि हम तो कहते हैं कि दुल्हन और बच्चों को भी ले आओ, हमारा घर आबाद हो जायेगा। तो तुम लोग आ रहे हो न?’
मैं बहुत खुश हुआ कि सारी उम्र भटकने के बाद बाबा को एक घर मिल ही गया जिसे वह अपना कह सकते हैं। मैंने आने का वादा भी कर लिया और इरादा भी।
फरवरी 1989 ई. में अचानक खबर आई कि बाबा जिस घर को लेकर इतना खुश हो रहे थे, उन्होंने वह भी छोड़ दिया और एक ऐसे मकान में चले गये जहाँ उनके अलावा कोई और नहीं रह सकता।
किसी ने सच ही कहा है, 'बंजारे के सिर को पक्की छत रास नहीं आती!’

(लिप्यंतरण- शकील सिद्दीकी)

जावेद सिद्दीकी थियेटर और सिने जगत का चर्चित नाम है। थियेटर और सिनेमा, दोनों क्षेत्रों में उनका महत्वपूर्ण योगदान है। इप्टा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं तथा नियाज़ हैदर का लम्बा सान्निध्य उन्हें प्राप्त रहा है।


"प्रगतिशील वसुधा'' के वर्ष में सामान्यतः 4 अंक प्रकाशित होते हैं,
वसुधा के कई बहुत महत्त्व के विशेषांक भी चर्चा में रहे हैं.
यहाँ प्रस्तुत 'वसुधा-85'अप्रैल-जून 2010 का अंक है.
---------------------------------

अंक की प्राप्ति या सम्पादकीय संपर्क के लिए आप - vasudha.hindi@gmail.com
पर e-mail कर सकते हैं, या
0755-2772249; 094250-13789 पर कॉल कर सकते हैं.
प्रो. कमला प्रसाद
एम.आई.जी.31,निराला नगर,भदभदा रोड,भोपाल (म.प्र.) 462013
को लिख सकते हैं ....

शनिवार, सितंबर 04, 2010

अष्टभुजा शुक्ल की कवितायेँ..

'अष्टभुजा शुक्ल' हिंदी के वरिष्ठ और चर्चित कवि हैं. पिछले दिनों फेसबुक की एक चर्चा में मुझ से पूछा गया कि ये 'अष्टभुजा शुक्ल' कौन हैं? दुर्भाग्य से तात्कालिक सन्दर्भ फुटबाल के भविष्य-(वक्ता)बकता पॉल आक्टोपस का था. एक हिंदी कवि को वैसे भी इन्टरनेट का समुदाय अभी थोड़ा कम-कम ही जानता है, यूँ ही बात उठी... 'वसुधा-85' में अष्टभुजा शुक्ल को पढ़ते हुए लगा कि क्यों न अष्टभुजा जी की कविताओं को यहाँ पोस्ट किया जाये जिससे 'नेट' पर कुछ और लोग भी इस दौर के एक बहुत महत्वपूर्ण और भिन्न शैली के एक कवि से परिचित हों.. अष्टभुजा शुक्ल को जिन्होंने पहले पढ़ा, सुना या देखा है वे जानते हैं कि वे देशज धज और अपनी ही तरह की विशिष्ट मुहावरे और शैली की कविता के लिए जाने जाते हैं..

केदार सम्मान 2009 के लिए बधाई के साथ, 'वसुधा' के सौजन्य से यहाँ प्रस्तुत हैं उनकी 2 कवितायेँ. एक कविता 'सतयुग, कविता और एक रुपया' तो आप 'वसुधा-85' के पन्नों पर भी पढ़ सकते हैं, दूसरी 'जवान होते बेटों से' यहाँ विशेषतः प्रस्तुत है. भविष्य में उनके बारे में, कविताओं पर और भी सामग्री आप यहाँ देख सकेंगे, फिलहाल उनकी कविताओं को देखें और इच्छा हो तो कुछ लिखें ..



'वसुधा' के अंकों के बारे में विस्तार से जानने के लिए आप बगल के कॉलम में 'वसुधा के अंक' की लिंक को क्लिक कर के वसुधा के विशेष पृष्ठ पर जा सकते हैं..




अष्टभुजा शुक्ल


1.
सतयुग, कविता और एक रुपया



जैसे कि एक रूपये माने चूतियापा यानि कि कुछ भी नहीं
वैसे ही एक रूपये माने बल्ले बल्ले यानि कि बहुत कुछ
और कभी कभी सब कुछ
निन्यानबे पैसे सिर्फ बाटा वालों के लिए अब भी एक कीमत है
हकीकत यह है कि एक रूपया
एक कौर या सल्फॉस की गोली से भी कम कीमत का है
एक रूपये का एक पहलू एक रूपये से भी कम है
तो दूसरा पहलू अशोकस्तम्भ यानि कि समूचा भारत
और भारतीयता की कीमत बाटा के तलवों से भी नीचे है
उसके नीचे नंगी इच्छाएँ कफन के लिए सिसक रही हैं
आधा भारत एक रूपये से शुरू होकर सिर्फ धकधकाता है
और भिवानी की तरह सिकुड़कर एक रूपये तक सिमट जाता है
गर्मियों में इतनी ठंडी किसी कोने में रख देने की चीज है
जैसे बेइमानियाँ बहुत जतन से रखी जाती हैं
वहीं पर अब एक रूपये कबूल करने में गोल्लक मुँह बिचकाता है
और बिजली नहीं रहती तो जनरेटर से फोटो कॉपी करने वाले
एक का तीन वसूलते हैं
एक रूपये तेल का दाम बढऩे से दस मिनट लेट से निकलते हैं
लोग घर से कि इतनी तेज उडऩे लगेंगी सवारी गाडिय़ाँ
कि दुर्घटनाओं की खबरों से पटे मिलेंगे सुबह के अखबार
न एक रूपये में अगरबत्ती न नहाने धोने का सर्फ साबुन
न आत्मा की मैल छुड़ाने वाला कोई अध्यात्म
उखड़ी हुई कैची का रिपिट लगाने में भी एक रूपया नाकाफी
एक पन्ने पर एक रूपया एक रूपया लिखकर भर डालने के लिए भी
कोई एक रूपये का मेहनताना लेने के लिए तैयार नहीं होगा
बल्कि मुफ्त में वह काम करके अपमानित कर देगा
एक रूपये को जैसे इसे केन्द्र में रखकर लिखी गई
यह कविता नामक चीज जिससे पटा हुआ बाजार
ऐसी कविताएँ यदि मर जाएँ बिना किसी बीमारी के
तो दो घंटे भी ज़्यादा होंगे कुछ आलोचना को रोने के लिए
इससे सिर्फ इतना भर नुकसान होगा कि
विलुप्त हो जाएगी कवियों की नस्ल और तब खाद्यान्न का संकट
कुछ कम झेलना पड़ेगा इस महादेश की शासन व्यवस्था को
ऐसी कविताओं की एक खासियत ये आलोचनाहंता है
दूसरी यह हो सकती है कि किसी प्रकार की उम्मीद की
जुंबिश से भी ये समाज को काफी दूर रखती हैं
जैसे हमारे समय का कवि खुद को काफी दूर रखता है अपने समाज से
आने वाला समय शायद साहित्य के इतिहास को कुछ इस
तरह रेखांकित करेगा कि हमारा समय एक कविता-शून्य समय था
इसीलिए यह कविता के लिए सबसे बेचैन रहने वाले समय के रूप में
जाना जाएगा और विख्यात होगा उतना ही जितना कि
अपने तमाम अवमूल्यन के लिए कुख्यात हो चुकी है एक रूपये की मुद्रा
फिर भी अरबों की संख्या भी नहीं काट सकती एक विषम संख्या को
क्योंकि एक एक, आधारभूत विषम संख्या है
वैसे ही जब मर जाएगी एक रूपये की मुद्रा तो उसकी अन्त्येष्टि में
माचिस की एक तीली भी खर्च नहीं करनी पड़ेगी लेकिन
तबाही मचेगी वह कि रहने वाले देखेंगे तांडव
और मन ही मन मनाएंगे कि हे प्रभू, हे लोकपाल, हे पूँजीपुत्र
कि कीमतें चीजों की या कवियों की
किसी भी विधि से, अनुष्ठान से या किसी अनियम से भी
घट जाती एक रूपये तो वापस आ जाता बल्ले बल्ले
वापस आ जाती हमारी बिकी हुई कस्तूरी, केवड़ा
और जितनी भी महकने वाली चीजें, हमारी दुनिया से गायब हो चुकी हैं
वैसे ज्यादा से ज्यादा सच बोलने के इन दिनों में
झूठ क्या बोला जाय पाप बढ़ाने के लिए
क्योंकि अपराध तो वैसे ही आदतन इतना बढ़ चुका है
कि घटते घटाते कम से कम हाथी जितना बचेगा ही
इसलिए कहना पड़ता है कहकुओं को कि
एक रूपये के मर जाने से दुनिया किसी
संकट में नहीं फँसेगी
क्योंकि उसके विकल्प के रूप में अब चलायी जा सकती है
हत्या, बेरोजगारी, बलात्कार और आत्महत्या में से कोई भी एक चीज़
और समाज की जगह थाना, एन.जी.ओ., कैफे साइबर, बार
या कोई राजनीतिक पार्टी इत्यादि
लेकिन उखड़ी उखड़ी बातों के झुंड से
अगर निकल आए काम की एक कोई पिद्दी-सी बात भी
तो मानना पड़ेगा कि कविता की धुकधुकी अभी चल रही है
और अगर एक रूपये कीमतें घट जाएँ किसी भी अर्थशास्त्र से
तो फिर वापस आ जाएगा सतयुग
वानर सबके कपड़े प्रेस करके आलमारियों में रख देंगे
शेर आएगा और कविता लिखते कवियों को बिना डिस्टर्ब किए
साष्टांग करके गुफा में वापस लौट जाएगा
सफाईकर्मियों को शिमला टूर पर भेजकर
राजनीति के कार्यकर्ता गलियों में झाडू लगाएँगे
पुलिस की गाड़ियां प्रेमियों को समुद्रतट पर छोड़ आएँगी
पागुर करते पशु धरती पर छोटे छोटे बताशे छानेंगे
बादल कहेंगे हे फसलों तुम्हें कितने पानी की दरकार है
और वह साला सतयुग राम नाम का जाप करने
या रामराज्य पर कविता लिखने वाले महा महाकवियों की वाणी से नहीं
बल्कि चीज़ों की कीमतें एक रूपये घट जाने से आयेगा...


**

2.
जवान होते बेटों!


जवान होते बेटों
इतना झुकना
इतना
कि समतल भी खुद को तुमसे ऊँचा समझे
कि चींटी भी तुम्हारे पेट के नीचे से निकल जाए
लेकिन झुकने का कटोरा लेकर मत खड़े होना घाटी में
कि ऊपर से बरसने के लिए कृपा हँसती रहे
इस उमर में
इच्छाएँ कंचे की गोलियाँ होती हैं
कोई कंचा फूट जाए तो विलाप मत करना
और कोई आगे निकल जाए तो
तालियाँ बजाते हुए चहकना कि फूल झरने लगें
किसी को भीख न देना पाना तो कोई बात नहीं
लेकिन किसी की तुमड़ी मत फोडऩा
किसी परेशानी में पड़े हुए की तरह मत दिखाई देना
किसी परेशानी से निकल कर आते हुए की तरह दिखना
कोई लड़की तुमसे प्रेम करने को तैयार न हो
तो कोई लड़की तुमसे प्रेम कर सके
इसके लायक खुद को तैयार करना
जवान होते बेटो
इस उमर में संभव हो तो
घंटे दो घंटे मोबाइल का स्विच ऑफ रखने का संयम बरतना
और इतनी चिकनी होती जा रही दुनिया में
कुछ खुरदुरे बने रहने की कोशिश करना
जवान होते बेटों
जवानी में न बूढ़ा बन जाना शोभा देता है
न शिशु बन जाना
यद्यपि के बेटों
यह उपदेश देने का ही मौसम है
और तुम्हारा फर्ज है कोई भी उपदेश न मानना...


संपर्क : संस्कृत महाविद्यालय, चित्राखोर, पोस्ट- बरहुआ, जिला-बस्ती (उ.प्र.)

"प्रगतिशील वसुधा''के वर्ष में सामान्यतः 4 अंक प्रकाशित होते हैं, वसुधा के कई बहुत महत्त्व के विशेषांक भी चर्चा में रहे हैं. यहाँ प्रस्तुत 'वसुधा-85'अप्रैल-जून 2010 का अंक है. अंक की प्राप्ति या सम्पादकीय संपर्क के लिए आप - vasudha.hindi@gmail.com पर e-mail कर सकते हैं, 0755-2772249; 094250-13789 पर कॉल कर सकते हैं, प्रमुख संपादक प्रो. कमला प्रसाद को एम.आई.जी.31,निराला नगर,भदभदा रोड,भोपाल (म.प्र.) 462013 के पते पर लिख सकते हैं ....




सोमवार, अगस्त 30, 2010

नई कोशिश..

'शीर्षक' की शुरुआत के साथ ही टिप्पणियों के खेल से पैदा खिन्नता ने कुछ दिनों के लिये मुझे फिर पीछे धकेल दिया था, सचमुच सोचे हुए के ठीक विपरीत, ब्लॉग पर साहित्यिक मंच के मेरे विचार को ध्वस्त कर के चर्चायें न सिर्फ असाहित्यिक हो चली थीं बल्कि बेहद फूहड़ व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप के लिए इस ब्लॉग का उपयोग मुझे दुखद लगा और मैं कुछ दिनों के लिए शुतुरमुर्ग कि तरह गर्दन रेत में डाले बैठा रहा, शुतुरमुर्ग इसलिए कह रहा हूँ कि मैं जानता था और हूँ भी कि मैंने अगर इस ब्लॉग पर से टिप्पणियां हटा भी दीं तो क्या लोगों के द्वेष-विद्वेष में कहीं कोई फर्क तो आया नहीं!
बहुत आत्मीयता से अपने शहर और समूह को याद करने की कोशिश का भी एक दुखी अंत करने की घोषणा तो नहीं पर ये ज़रूर कहना चाहूँगा कि दोनों तरफ से अविश्वास और षड्यंत्र तक के आरोपों के बाद अब मन काफी भरा-भरा है. लोग एक दूसरे के साथ अपने सन्दर्भों को ले कर स्थायी रिश्ते तय कर चुके होते हैं और कोई मौका ऐसा नहीं छोड़ना चाहते है कि जिस का उन्हें बाद में मलाल हो कि हाय! उस समय हम कैसे चूक गए... या कि उस की बात के बदले एक निशाना हम ने भी क्यों न साध लिया...
बहरहाल, एक एपिसोड के बाद, अभी भी मैं चाहता यही हूँ कि 'शीर्षक' के मंच का उपयोग अधिक रचनात्मक और साहित्यिक ही हो.. 'शीर्षक' के साथ 'वसुधा' के पुराने रिश्तों की चर्चा पुरानी पोस्ट्स में कर चुका हूँ, प्रो. कमला प्रसाद, 'वसुधा' के प्रधान संपादक हैं, रीवा विश्विद्यालय के हिदी विभाग प्रमुख के रूप में हमारे (जिस समूह को अभी तक मैं केंद्र में ले कर चल रहा था) गुरु भी हैं, हम में से बहुतों के लिए वे आज भी आत्मीय पारिवारिक बुजुर्ग भी हैं, उन से 'वसुधा' के अंक और सामग्री को इन्टरनेट पर लाने का आग्रह मेरा पुराना आग्रह रहा है. एक बातचीत के बीच हमारी सहमति इस बात पर बनी कि अगर वसुधा ही क्या कहीं भी कुछ बेहतर और महतवपूर्ण कुछ लिखा और छापा जा रहा है तो अपनी कोशिश ये भी तो हो सकती है कि उसे ऐसे किसी मंच से और विस्तार दिया जा सके.
मैंने पहले भी लिखा है कि 'शीर्षक' मेरे लिए अपनी नितांत व्यक्तिगत भड़ास निकालने का कोई जरिया नहीं है, मैं ऐसा सोचना भी नहीं चाहता हूँ, मुझे जब ऐसा ही करना होगा तों मैं vivek.blogspot... जैसा कुछ बना लूँगा, पर 'शीर्षक' मेरे लिए इस से कुछ आगे और बेहतर का संकल्प है..
कमला प्रसाद जी से बात-चीत के बहाने मुझे एक बेहतर विकल्प समझ में आता है कि मैं 'वसुधा' के चयन में से भी कुछ अपना चयन यहाँ प्रस्तुत करूँ जिससे 'वसुधा' का भी संछिप्त चयनित संस्करण 'नेट' पर आये और कुछ बेहतर पढ़ने का अवसर भी आप लोगों के हाथ आये. खास तौर पर उन के लिए जो कम से कम भौतिक ढंग से पत्रिका के अंक को छूने-महसूसने और पढ़ने से वंचित हैं. जापान, इटली या अमेरिका में भी नेट पर अच्छी हिंदी सामग्री खोजने वालों की संख्या बहुत ज्यादा न भी हो तो भी हम 'कुछ' लोगों के लिए ही सही, कुछ करने की कुछ कोशिश ही कर सकें..
'प्रगतिशील वसुधा' का अंक-85 अभी आया ही आया है, आप में से बहुतों ने उस में से अपना चयन पढ़ लिया होगा.. चलिए यहाँ थोड़े उबड़-खाबड़ अंतराल पर आप यहाँ मेरा चयन पढ़ सकेंगे.

पिछले दिनों फेसबुक की एक चर्चा में मुझ से पूछा गया कि ये 'अष्टभुजा शुक्ल' कौन हैं? दुर्भाग्य से तात्कालिक सन्दर्भ फुटबाल के भविष्य-(वक्ता)बकता पॉल आक्टोपस का था, यहाँ 'वसुधा-85' में अष्टभुजा शुक्ल को पढाते हुए याद आया की चलिए 'नेट' पर कुछ और लोग भी इस दौर के एक बहुत महत्वपूर्ण और भिन्न शैली के एक कवि से परिचित होंगे..
अगली पोस्ट में उन की दो कवितायें ... निस्संदेह 'वसुधा-85' के सौजन्य से ...

शुक्रवार, मई 28, 2010

कुछ सूफियाना सा..

इस बार कुछ शेर हैं, जिन से बात शुरू करता हूँ..

तू सुन के मेरी इल्तिज़ा क्या करेगा
जो पहले से सोचा हुआ था, करेगा
... और

आइना तुम भी हो, आइना मैं भी हूं
देखूं तो आती है लौट कर रोशनी


मौला ऐसा सलीका हमें बख्श दे
हम लुटाते रहें उम्र भर रोशनी
... ...

शेर हमारे साथी योगेन्द्र मिश्र की ग़ज़ल से हैं.

योगेन्द्र, रीवा के हमारे युवा समूह में बहुविध चर्चित नाम रहे हैं, बहुत सारे क्षेत्रों में योगेन्द्र की प्रतिभा को स्वीकार किया जाता रहा है. गंभीर से गंभीर काम को पूरी गंभीरता से निभाने के लिए भी और गंभीर से गंभीर बात को मन की मौज हो तो हवाओं में उड़ा सकने की उन की विलक्षण योग्यता आज भी हम मित्रों के बीच चर्चा का विषय होती है, उन के पास अद्भुत और अधिकतर अकाट्य तर्क क्षमता है जो कुछ अर्थों में उनके ओशो के शिष्य होने का सही परिचय देती है. कभी-कभी कुतर्क में भी वे सिद्ध हैं, उनकी एक खास अदा रही है(शायद इसे उनकी मज़ा लेने की अदा कहना चाहिए) कि वे देर तक आप का समर्थन करते हुए यदि आपके सामने वाले से सहमत होने की सही फीस (सहमत होने की ये फीस उस समय 5 रू. हुआ करती थी) मिले तो फीस के मुताबिक आपके विरोधी से भी उतनी ही दमदार सहमति दिखा सकते हैं, कॉलेज के समय में ये मजे लेने का उनका खेल, हमारे रंगसमूह के खासे मनोरंजक खेलों में से एक रहा है. वैसे ये खेल सिर्फ बातों-बातों का ही खेल बना रहा.

योगेन्द्र, दर्शन शास्त्र और हिन्दी के मेधावियों में से हैं. वे एक अच्छे रंगकर्मी के साथ-साथ कॉलेज के समय से एक अच्छे वक्ता के रूप में जाने जाते हैं, तथ्य और तर्क को सम्मिश्रित कर के एक लगभग चकित कर देने वाला प्रस्तुतिकरण कौशल योगेन्द्र की पहचान का हिस्सा है. भीतर से संवेदनशील और संघर्षशील अपने मूल भोले स्वभाव को वे एक खास किस्म के आक्रामक ऊपरी व्यवहार के भीतर सहेजे रखना चाहते हैं. योगेन्द्र ने जिन परिस्थितियों में अपने व्यक्तित्व को साधा और सहेजा है, उसके बारे में ज्यादा कुछ कहने से बेहतर सिर्फ इतना ही समझना काफी है कि जहां लोग फिसल कर अंधी खोह(ब्लैक होल) में गुम जाया करते हैं वहां उन्होने तमाम संघर्षों के बीच खुद के लिए स्वयं एक रोशन राह बनाई है.


रोजी-रोटी के लिए वे पुलिस की नौकरी करते हैं और आज भी ग़ज़लें लिखते हैं, कई पुलिस वाले यूं तो उपन्यास लिखते ही हैं, पर योगेन्द्र ग़ज़लें लिख रहे हैं, और खूब लिख रहे हैं. उनकी नौकरी और उनके मूल स्वभाव के बारे में शायद यही कहना ठीक है कि गलत जगह पर सही आदमी.. देखने की बात यही है कि वे पुलिसिया दांव-पट्टी से खुद को और अपनी ग़ज़ल को कैसे और कब तक बचाते हैं.. चलिए ये तो हम समय के साथ देखेंगे ही पर आइये अभी उनकी दो बहुत खूबसूरत ग़ज़लें यहां देखें...

योगेन्द्र की ग़ज़लों में एक खास किस्म का सोंधापन है जो उनकी संवेदना, संघर्ष, प्रतिबद्धता और उनके भीतर के सूफियाने की संगत का मिला-जुला सा कुछ बन कर सामने आता है. उनके रचनाकर्म की पहचान उनकी ये दोनों ग़ज़लें मुझे उनके भीतर का बेहतर परिचय समझ आती हैं सो उन्हें आप सब के साथ बांटता हूं... फिर बतायें कि ....

1.

दम-ब-दम रोशनी, दर-ब-दर रोशनी
मेरे मेहबूब की रहगुज़र रोशनी

उसने देखा तो दिल में दिये जल उठे
उसकी ऑंखों में थी इस कदर रोशनी

जाने कितने उठाये सितम दौर के
तब कहीं बन सकी हमसफर रोशनी

तुम न जाओ कहीं, सिर्फ बैठे रहो
और बिखरती रहे रात भर रोशनी

आइना तुम भी हो, आइना मैं भी हूं
देखूं तो आती है लौट कर रोशनी

मौला ऐसा सलीका हमें बख्श दे
हम लुटाते रहें उम्र भर रोशनी

वक्त की कोख में पलती रहती है पर
सबको आती नहीं है नज़र रोशनी



2.

तू सुन के मेरी इल्तिज़ा क्या करेगा
जो पहले से सोचा हुआ था, करेगा

मेरे दिल की भी तू लगायेगा बोली
तू बाज़ार में है भला क्या करेगा

मेरे पास दिल है, दुआयें हैं तेरी
कोई शख्स मेरा बुरा क्या करेगा

जो तक्मील करता नहीं अपने वादे
वो हक़ मे किसी के दुआ क्या करेगा

जो तासीर तेरी वो तक़दीर होगी
तू जन्नत का ले के पता क्या करेगा

अभी ख्वाब ज़िंदा हैं मेरे ज़ेहन में
अभी से मेरा फैसला क्या करेगा

मंगलवार, मई 11, 2010

एक रंग जो ठहरा हुआ सा बस लगता है...


बहुत दिनों से इंतजार में हूँ, इंतजार कुछ लंबा ही होता जा रहा है. मज़ा ये भी है कि ये तक पता नहीं कि इंतज़ार किसका है. जुम्मा-जुमा कायदे से 2 पोस्ट भी नहीं लिखीं कि लगा, कि कुछ मज़ा आ जाए ऐसा कुछ समझ में आए तो पोस्ट किया जाए... ब्लॉग शुरू करने के पहले जो कुछ योजनायें थीं वो कुछ बचकानी सी लगने लगीं. उत्साहित हो कर ब्लाग बना तो लिया, पहले भी-2 साल पहले, दो बार बनाया था. संकोच में बंद कर दिया.

आम तौर पर देखता हूँ, भड़ास निकालने (अपनी रचनात्मकता के ज्यादा भरम में मैं हूँ नहीं) के लिए इस मंच का उपयोग करने से किसी को भी बहुत परहेज नहीं है, कुछ भी ठूंसा-ठांसी करो और पोस्ट पटक दो. पर संकट यह था कि कुछ आदत के मारे अपना भरोसा कुछ इस बात पर था भी नहीं और फिर कुछ बेहद व्यवस्थित और सुचिंतित और रचनात्मक ब्लॉगर भी इसी दुनिया में हैं, जब भी उन को देखा , सकुचा कर रह गया.

बहरहाल, इस बार 'शीर्षक' के प्रिंट एडीशन की दुर्घटना फिर न दुहरायी जाए, दो अंकों के बाद शीर्षक बंद हो गई, कहीं इस बार भी वैसा ही कुछ न हो इस दबाव में अपने आलस को (जिसके आगे मेरे पिता जी 'घनघोर' विशेषण जोड़ना चाहेंगे) छोड़ कर मैंने अपनी यूनिकोड टाइपिंग के अभ्यास सत्र के लिए इधर-उधर और घर से समय चुरा कर के यह पोस्ट लिखना शुरू की है..

योजना कुछ यूं है कि बहुत सारी लंबी योजनाओं के, पोस्ट के पहले उन लोगों से परिचय भी हो जाए जो 'शीर्षक' के योजनाकार भी थे और उसकी सफलता के साझेदार भी थे और अब आज 'शीर्षक' से आगे अपनी नई और अधिक विस्तृत पहचान हिन्दी संसार में बना चुके हैं. पहली पोस्ट में जिन ओम द्विवेदी की ग़ज़ल आप ने पढ़ी, ये 'सपने के पीछे ज़िद...' शीर्षक से दूसरी पोस्ट के वही ओम पथिक हैं जो दैनिक जागरण से टहलते हुए अब नईदुनिया-इंदौर में जा जमे हैं. तब हम ओम को गीत-ग़ज़ल के लिए जानते थे, रंगमंच पर उनके शानदार अभिनय का हम सभी लोहा मानते रहे हैं. हमारे समूह में वे रंगमंच के रंगदार रहे हैं. आजकल वे http://meetheemirchee.blogspot.com/ पर अपने व्यंग्य लेखन के लिए भी पहचाने जाते हैं, शायद उनकी मुस्कान और देर तक खिल-खिल गूंजने वाली (अट्टहास के लघु संस्करण तथा कुछ कोमल, कोमलता के मान से कोई स्त्रीवाची शब्द अभी मुझे सूझ नहीं रहा - समझें) उनकी हंसी का मारक व्यंग्य ही अब शब्द ले रहा है ऐसा भी उनको जानने वाले शायद मानेंगे. मैं उनके व्यंग्यों का निरीह शिकार भी रह चुका हूँ, आजकल बड़े लोगों पर उनकी नज़र है और मेरी जान को कुछ चैन. अपनी ओर से तो पहले ही लिख चुका हूँ, मैं उनके गीतों, ग़ज़लों और दोहों पर फिदा हूँ.
अब.. इस बार, आशीष....... आशीष यानि शीर्षक के अंक-1 के कुमार आशीष, जिन की शीर्षक के प्रवेशांक में छपी दो कविताओं के 4 पृष्ठों को आप नीचे पुराने पन्नों की तरह देख पा रहे हैं . समय के साथ कुमार आशीष, ' कुमार' नहीं रहे ... डॉ. आशीष त्रिपाठी हो कर झालावाड़(राजस्थान) के राजकीय महाविद्यालय से चलते हुए बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में पहुंचे, हमारे लिए यह गौरव की बात हुई, इसलिए कि आमतौर पर सुनते और देखते आ रहे थे कि बी.एच.यू. से निकल कर लोग देश भर के हिन्दी विभागों में डटे हैं पर आशीष और नीरज खरे जैसे कुछेक ने रीवा और सागर को वहां एक पहचान दिलाई जहां सिर्फ घूम-टहल आने की लोग महीनों चर्चा करते हैं. आशीष न सिर्फ बी.एच.यू. पहुंचे, वहां पहुंच कर उन्होने वि.वि. के अध्यापकों और छात्रों के बीच गंभीर छवि बनाई है.. हिन्दी विभाग में रीडर डॉ. आशीष त्रिपाठी ने हिन्दी आलोचना में बड़ा नाम बनाया है, साल की शुरूआत में दिल्ली पुस्तक मेले में उन्होने 05 पुस्तकों के साथ लोगों का ध्यान खींचा.. प्रो.नामवर सिंह के लिखे-बोले पर 08 किताबों की योजना में से 04 तो राजकमल से आ गईं, 04 आने वाली हैं.

पुस्तक मेले में ही उनका बहुप्रतीक्षित कविता संग्रह 'एक रंग ठहरा हुआ' आया, जिसके कवर को आप यहां देख रहे हैं. ये उनका पहला कविता संग्रह है, वाणी प्रकाशन से.

आशीष, मेरे मित्र हैं, 20 बरसों से हम (ये गणना आज ही की है और करने के बाद मैं खुद चौंक रहा हूँ) लगातार प्रेम/झगड़े/बहस करते हुए मित्र और आगे पारिवारिक मित्र हैं. साहित्य के साथ रंगमंच की गहरी समझ के लिए हमारे समूह में उनकी प्रखर पहचान रही है, रंगभाषा पर उन की आलोचना पुस्तक 2 बरस पहले ही शिल्पायन से छप चुकी है. बेहद व्यवस्थित वक्ता और व्यक्तित्व वाले आशीष भी कुछ हद तक आलसी हैं, ऐसा वे खुद के बारे में कुछ मॉडेस्ट हो कर कहते हैं. पर उनका आलस्य कुछ ही मामलों में है, वरना तो वे.... बाकी क्या कहना.. उन का काम खुद गवाही देता है.

शीर्षक के पुराने पन्नों की कविताओं को, जो नीचे हैं, आप चाहें तो क्लिक कर के इन्लार्ज कर लें और पढ़ें, कविता 'देश-दुनिया के भविष्य हैं वो' में पिता की चिंताओं और उनके उत्तर को केन्द्र में लेती उनकी यह कविता शीर्षक में 1992 में आयी थी, उनका संग्रह 2010 में आया है, उनके संग्रह से एक कविता 'पिता की इच्छाएँ' आप के लिए प्रस्तुत है. दोनों कविताओं में पिता शब्द के अलावा और तो कुछ खास समान नहीं है, सिवाय इसके कि कवि एक है. संग्रह से ये चयन बिल्कुल यूं ही... संग्रह और आशीष दोनों पर ही अभी बहुत बातें बाकी हैं... वो फिर कभी....



पिता की इच्छाएँ


पिता जीते हैं इच्छाओं में

पिता की इच्छाएँ
उन चिरैयों का झुंड
जो आता है आँगन में रोज
पिता के बिखराये दाने चुगने

वे हो जाना चाहते हैं हमारे लिए
ठंडी में गर्म स्वेटर
और गर्मी में सर की अँगौछी

हमारी भूख में
बटुओं में पकते अन्न की तरह
गमकना चाहते हैं पिता
हमारी थकान में छुट्टी की घंटी की तरह बजना चाहते हैं वे

पिता घर को बना देना चाहते हैं
सुनार की भट्ठी
वे हमें खरा सोना देखना चाहते हैं

लगता है कभी-कभी
इच्छाएँ नहीं होंगी
तो क्या होगा पिता का

गंगा-जमुना की आखिरी बूंद तक
पिता देना चाहते हैं चिरैयों को अन्न
पिता, बने रहना चाहते हैं पिता.

(एक रंग ठहरा हुआ - से)










'शीर्षक' के इन पुराने पन्नों पर नज़र डालें और बताएं कि क्या कुछ और पुराने पन्ने आपकी नज़र किये जाएं......

शुक्रवार, अप्रैल 30, 2010

सपने के पीछे ज़िद..



शीर्षक हमारा सपना था, हम यानि ओम, आशीष और मैं. ओम तब ओम पथिक हुआ करते थे, आशीष तब कुमार आशीष होते थे और मैं खुद क्षितिज विवेक हुआ करता था. ये सपना मध्यप्रदेश के रीवा में तब के हम बच्चों की आँखों में अंखुआया था.
रीवा जो तब कस्बानुमा शहर था और शायद अब भी, वैसे तो यह मध्य्रप्रदेश के नक्शे में संभागीय मुख्यालय था पर सतना जिला मुख्यालय तब भी हमसे (रीवा से) अधिक विकसित,व्यवस्थित और अधिक व्यावसायिक शहर था और आज भी है. पर रीवा अपनी अकादमिक संस्थाओं और साहित्यिक सक्रियता के लिए तब भी अलग से पहचाना जाता था और आज भी है. ऐसा नहीं था कि हमारे इस कस्बे में पान की दुकानें कम थीं या फिल्मों में समय काटने के लिए टॉकीज़ें कम थीं पर हमारे अड्डे में, तब जब कमला प्रसाद जी वहां थे तो उनका घर F-20, सिविल लाइन्स या सेवाराम जी (जो बाद में मेरे अध्यापक भी बने) का घर B-14,टी आर एस कैम्पस, जो कुमार आशीष का भी घर था, (जहां मैंने अपने घर के बाद सबसे ज्यादा समय बिताया) हुआ करता था. इसी शहर में हमने नामवर सिंह, विश्वनाथ त्रिपाठी, रमेश कुंतल मेघ, राजेन्द्र यादव और काशीनाथ सिंह, विष्णु खरे, भगवत रावत, चंद्रकांत देवताले, राजेश जोशी से ले कर बद्रीनारायण जैसे जाने कितने बड़े-बड़े नामों को जाना.

कॉलेज के शुरुआती दिनों में ही कहीं युवा उत्सव के रंगमंच से ले कर इप्टा में आशीष और ओम की सक्रियता के बीच, हनुमंत किशोर,राजेश दादा, सुमन सिंह के कालिगुला की टीम से मेरे परिचय के साथ कुछेक रंगमंच की गतिविधियों के समानांतर मेरे लिए शीर्षक की योजना एक सपने की तरह मेरे सामने आयी. हस्तलिखित शीर्षक की आरंभिक योजना बनाने के लिए सबसे बड़ी सुविधा थी कि ओम की हैण्डराइटिंग बहुत बढ़िया थी, पर पेप्सी के विज्ञापन के पहले भी हमारा दिल मोर मांगता था, मैं अपनी तरह से जुटा रहा कि कुछ व्यवस्था बने तो शीर्षक का अंक बकायदा प्रकाशित हो सके.. कुछ स्थानीय व्यावसायिक सहयोग के भरोसे हम ने मामला आगे भी बढ़ाया और युवा रचनाशीलता पर केंद्रित शीर्षक के दो अंक बड़ी धूम-धाम से निकले भी... पर हम दो ही अंकों में बिखर गये... कारण कुछ आर्थिक.. कुछ हमारी आपसी समझदारी..
कुल मिला कर एक सपना ज़िंदगी की और ज़रुरतों के बीच दब गया.
1993 के बाद शीर्षक के अंक स्मृति की बातें बन कर रह गये... हमारी टीम को कुछ करने के नाम इस बीच वसुधा भी रीवा आ गई और फिर लगा कि यहीं कुछ सीखा जाए.. प्रकारांतर से हम लड़कों की टोली भी वसुधा की टीम हो गई. कुछ दिनों बाद कमला प्रसाद जी के साथ वसुधा तो खैर भोपाल गई पर हमारी सक्रियता जाने और कहां... जो बात पीछे छूटी, वो कुछ टीसी भी, पर ईमानदार हो कर कहें तो प्राथमिकतायें भी कुछ बदल गईं..
इसे कोई कहानी या संस्मरण की तरह की पोस्ट मत समझिये. ये तो सिर्फ एक ज़िद के फिर सिर उठाने के बहाने की याद भर है. ब्लागिंग के ख्याल के साथ, पहले एक-दो प्रयास के बाद शीर्षक के सपने ने फिर अंगड़ाई ली है...
अब बातें तो बहुत हैं पर धीरे-धीरे सिलसिलेवार ढंग से आगे चलेंगी अगर सब चाहेंगें तो...

सोमवार, अप्रैल 26, 2010

पहला ख़त..


पहला ख़त है, बहुत सोचा कि कहाँ से शुरू करूं... सोचते हुए बहुत सी बातें और बहुत से मित्र याद आए, ओम द्विवेदी मेरे पुराने मित्र हैं, पहले से ब्लाग की दुनिया में टहल-घूम कर रहे हैं, अपनी बक-झक तो मैं आगे करुंगा ही. सोचा कि आज शुरुआत क्यों न एक ब्राह्मण से ही कर लूं..... वैसे ओम को ब्लाग की दुनिया व्यंग्यकार के रूप में ज्यादा जानती है पर मैं उनके गीतकार पर रीझा हुआ हूँ... आज उनकी ये ग़ज़ल पेशेनज़र है.

सोते में चीख़ता है सुल्तान आजकल

टूट पड़ा आँगन में आसमान आजकल।
साँसों में उठ रहा है तूफान आजकल।

कबूतर ने जने हैं कई नन्हें कबूतर,
डर-डर के बाज भरता है उड़ान आजकल।

फ़क़ीर के कदमों में है रफ़्तार कुछ अधिक,
सोते में चीख़ता है सुल्तान आजकल।

पड़ोसी का घर खंगालते खंजर लिए हुए,
तकिए के नीचे छिप गया शैतान आजकल।

मुर्दा से दिखे चेहरे जो भी दिखे यहाँ,
हँसने लगा है बस्ती में शमशान आजकल।

पहुँचा है माँ की कोख तक बाज़ार का दख़ल,
सामान की मानिन्द हैं नादान आजकल।

आप के लिए ओम के ब्लाग का पता आगे अटैच कर सकूंगा... फिलहाल तो बताएं ग़ज़ल कैसी है.
Related Posts with Thumbnails